भरतकुमार सोलंकी
पर्युषण पर्व जैन धर्म का सबसे महत्वपूर्ण और पवित्र पर्व हैं। इसका सार केवल उपवास, तप या नियमों तक सीमित नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और क्षमा की भावना को जीवन में उतारना है। विशेष रूप से संवत्सरी के दिन जब हम “मिच्छामि दुक्कडम्” कहते हैं, तब हम समस्त जीवों से क्षमा मांगते हैं। लेकिन सवाल यह हैं कि क्या क्षमा केवल साल में एक दिन मांगने का उत्सव है?
वास्तविकता यह है कि क्षमा कोई सालाना औपचारिकता नहीं, बल्कि जीवन जीने का मूलमंत्र है। यदि हम गहराई से देखे तो विकसित देशों की संस्कृति में भी यही भाव विभिन्न रूपों में विद्यमान है; वहां लोग दिनचर्या में ‘Thank You’ और ‘Sorry’ बोलना एक सामान्य शिष्टाचार मानते हैं। दरअसल, यह केवल शिष्टाचार नहीं, बल्कि दूसरे के प्रति आभार और अपनी भूल स्वीकार करने की जीवनशैली है।
सोचिए, यदि हम हर दिन की शुरुआत और अंत ईश्वर के प्रति धन्यवाद और क्षमा के भाव से करे, तो जीवन कितना सहज हो जाएगा। रात को सोने से पहले एक छोटी प्रार्थना करे – “हे प्रभु, आज के दिन आपने जो सुख दिया, उसके लिए धन्यवाद और जिनसे भी अनजाने में मैंने भूल की, उनसे क्षमा चाहता हूं।” यह केवल धार्मिक भाव नहीं, बल्कि आत्मा की शांति और समाज की समरसता का सूत्र हैं।
यह भावना केवल ईश्वर या बड़े-बुजुर्गों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। दिनभर जिनसे हमारा व्यवहार होता हैं – चाहे वह घर का नौकर हो, सुरक्षा करने वाला वॉचमैन हो, गाड़ी चलाने वाला ड्राइवर हो या दुकान पर सामान बेचने वाला दुकानदार – सबके प्रति धन्यवाद और क्षमा का भाव होना चाहिए। सोचिए, अगर ड्राइवर आपको सुरक्षित गंतव्य तक पहुंचा दे और आप धन्यवाद कहें, तो उसके चेहरे पर मुस्कान आ जाएगी। यही क्षमापना का वास्तविक स्वरूप हैं।
ठीक इसी तरह यदि दिनभर में किसी के साथ किसी छोटी-मोटी बात पर तकरार हो जाए, तो “सॉरी” कहने में कोई शर्म नहीं होनी चाहिए। बल्कि यही आपकी विनम्रता और आंतरिक शक्ति का प्रतीक है। यही भाव जीवन को आध्यात्मिक ऊँचाई देता हैं।
जब हम संवत्सरी प्रतिक्रमण में समस्त जीवों से क्षमा मांगते हैं, तो यह उन सभी के प्रति एक सामूहिक क्षमायाचना होती हैं, जिनसे हम पूरे वर्ष क्षमा मांगना भूल गए। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हम साल भर किसी से क्षमा न मांगें और फिर साल में एक बार माफी मांगकर संतोष कर ले। क्षमापना का सही अर्थ यही हैं कि हम हर पल “थैंक्स” और “सॉरी” को अपने जीवन में अपनाएँ।
संवत्सरी पर्युषण पर्व हमें यही शिक्षा देता हैं कि क्षमा केवल पर्व की औपचारिकता नहीं, बल्कि यह हमारी संस्कृति, हमारी आत्मा और हमारे व्यवहार का स्थायी हिस्सा बननी चाहिए।
