सामना संवाददाता / मुंबई
दिन-प्रतिदिन युवाओं में आत्महत्या का साया गहराता जा रहा है। मानसिक तनाव, आर्थिक संकट और सामाजिक दबाव ये तीनों कारक खतरनाक स्तर पर पहुंच गए हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, दुनिया में हर ४० सेकंड में कोई न कोई व्यक्ति आत्महत्या कर रहा है। वहीं भारत में प्रतिदिन लगभग ४७० लोग आत्महत्या करते हैं। भारत में आत्महत्या करने वाले राज्यों की सूची में महाराष्ट्र पहले नंबर पर है।
इस विकट पृष्ठभूमि में १० सितंबर को मनाया जाने वाला `विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस’ एक अहम सवाल बन गया है कि क्या समाज वास्तव में जागरूक होगा और आत्महत्या करने वालों को रोकने के लिए हाथ बढ़ाएगा। विश्व स्वास्थ्य संगठन की २०२३ की रिपोर्ट के अनुसार, दुनियाभर में हर साल ७ लाख से अधिक लोग आत्महत्या करते हैं। हर ४० सेकंड में एक व्यक्ति अपनी जीवनलीला समाप्त कर लेता है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के २०२३ के आंकड़ों के अनुसार, भारत में एक वर्ष में १,७०,९२४ लोगों ने आत्महत्या की यानी हर दिन लगभग ४६९ लोगों ने अपनी जीवनलीला समाप्त की। २०२२ की तुलना में आत्महत्या की दर में ३ प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
३६ प्रतिशत दिहाड़ी मजदूर और बेरोजगार
गौरतलब हो कि एलसीआरबी की रिपोर्ट से पता चला है कि आत्महत्या करने वालों में ३६ प्रतिशत लोग दिहाड़ी मजदूर और बेरोजगार हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि आर्थिक अस्थिरता और सामाजिक दबाव आत्महत्याओं के प्रमुख कारण हैं।
छात्रों की आत्महत्या दर में वृद्धि
इसमें छात्रों की आत्महत्या की दर में खतरनाक रूप से वृद्धि हुई है। २०२३ में देशभर में १३,०८९ छात्रों ने आत्महत्या की, जो पिछले दस वर्षों में सबसे अधिक है। महाराष्ट्र इस सूची में सबसे ऊपर है, जहां २२,००० से अधिक आत्महत्याएं दर्ज की गई हैं। किसानों की आत्महत्या, बेरोजगारी, शैक्षणिक तनाव और मानसिक बीमारी को इसके प्रमुख कारणों के रूप में रेखांकित किया गया है।
