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महाराष्ट्र में वेंटिलेटर पर १०८ एंबुलेंस सेवा! …३० करोड़ रुपए के भुगतान में भी `खेल’

-नासिक का रोका गया १.४५ करोड़ से ज्यादा का बिल
धीरेंद्र उपाध्याय / मुंबई
महाराष्ट्र में आपातकालीन १०८ एंबुलेंस सेवा सरकार की नाकामी की भेंट चढ़ गई है। इस सेवा के ३० करोड़ रुपए के भुगतान में भी ‘खेल’ सामने आया है, जिसमें से २८.६४ करोड़ रुपए का भुगतान तो कर दिया गया, लेकिन नासिक जिले का १.४५ करोड़ रुपए से ज्यादा का बिल रोक दिया गया है। ऐसे में जिले में आपातकालीन सेवाएं वेंटिलेटर पर जाने की संभावना जताई गई है। हालांकि, सरकार की तरफ से यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि आखिरकार नासिक जिले के भुगतान को क्यों रोका गया है। इसके तहत एक तरफ जहां सरकार जनता की जान बचाने के दावे करती है, वहीं दूसरी ओर इस घटना ने स्वास्थ्य सेवाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
राज्यभर में आपातकालीन स्थिति में तत्काल चिकित्सा सेवा देने वाली एमईएमएस एंबुलेंस पूरी तरह तैयार हैं, लेकिन फरवरी से अप्रैल तक के ३० फीसदी अदायगी को रोककर सरकार ने लाखों लोगों की जान से खिलवाड़ किया है। कुल ३०.०९ करोड़ रुपयों में से नासिक जिले की एंबुलेंस सेवा के लिए १.४५ करोड़ रोक दिए गए, जबकि २८.६४ करोड़ का भुगतान मंजूर किया गया। सरकार ने नई एमओयू और पुराने आदेशों के बीच एंबुलेंस सेवाओं को जारी रखा, लेकिन भुगतान में विलंब ने स्वास्थ्य व्यवस्था को गंभीर संकट में डाल दिया है। बताया गया है कि १.७० करोड़ रुपए की दंडात्मक कटौती के बावजूद शेष राशि अदा करने का आदेश तो दिया है, लेकिन वास्तविक भुगतान में देरी ने सेवाप्रदाताओं और जनता को भारी नुकसान पहुंचाया है।
बजट प्रावधान और वित्तीय अधिकार
उपरोक्त खर्च वित्तीय वर्ष २०२५-२६ के बजट प्रावधानों से किया जाएगा। वित्त विभाग के नियम और अधिकार पुस्तिका के अनुसार प्रशासनिक विभाग को भुगतान करने का अधिकार प्राप्त है। स्वास्थ्य सेवा के आयुक्त की मंजूरी के बाद सह-संचालक को कोषागार में तुरंत अदायगी अदा करने के निर्देश दिए गए हैं। सभी मासिक विवरण शासन को प्रस्तुत किए जाएंगे, लेकिन भुगतान में देरी ने सरकारी लापरवाही को उजागर कर दिया है।
कागजों में उलझी सरकार
राज्य सरकार की इस लापरवाही ने आपातकालीन स्वास्थ्य सेवा के सामने गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। बजट में प्रावधान होने के बावजूद एंबुलेंस का ३० फीसदी अदायगी रोके रखना साफ दर्शाता है कि सरकारी मशीनरी सिर्फ कागजी कामों और औपचारिकताओं में उलझी हुई है, जबकि आम जनता और आपदाग्रस्त लोगों की जान जोखिम में है। प्रशासनिक निर्णयों की यह धीमी गति और पारदर्शिता की कमी, जनता की सुरक्षा और जीवनरक्षक सेवाओं पर सरकार की असंवेदनशीलता को उजागर कर रही है।

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