सामना संवाददाता / मुंबई
महायुति सरकार विकास का ढिंढोरा पीट रही है, लेकिन यह ढिंढोरा महानगर विकास प्राधिकारण (एमएमआर) क्षेत्र में आने वाले कर्जत तालुका में पूरी तरह से फेल साबित हुआ है। इस तालुका में बारिश के मौसम में भी महिलाओं को एक घड़ा पानी के लिए घंटों पैदल चलना पड़ता है।
बताया जाता है कि कर्जत तालुका के एक गांव भोपलेवाड़ी में भारी बारिश के दौरान भी महिलाएं घड़े में पानी भरने के लिए पहाड़ी झरने तक घंटों पैदल चलकर पहुंचती हैं। जलजीवन मिशन योजना के तहत पानी के लिए लाखों रुपए खर्च किए गए, लेकिन पानी की समस्या का निदान नहीं हुआ यानी कागज पर ही जलापूर्ति योजनाओं का विकास हुआ है। जबकि भयावह सच्चाई यह है कि कई गांवों में पानी की भारी किल्लत है। यही कारण है कि बारिश में भी ग्रामीणों को कुआं या झरनों के पानी पर निर्भर रहना पड़ता है। इस पानी के लिए बहुत दूर तक फिसलन भरे पहाड़ी रास्तों को तय करना पड़ता है।
योजना पूरी, पर नल में एक बूंद पानी नहीं
बताया जाता है कि केंद्र सरकार की जलजीवन मिशन योजना का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं के सिर पर घड़े का बोझ कम करना है, लेकिन कर्जत तालुका में इस जलजीवन योजना का काम अभी भी रुका हुआ है। प्रशासन का कहना है कि कुछ जगहों पर योजना पूरी हो गई है, लेकिन जहां योजना पूरी हो गई है, वहां नल में एक बूंद भी पानी नहीं है। भोपलेवाड़ी में सर्दी, गर्मी और मानसून में भी पानी की कमी रहती है। जलजीवन योजना कागजों पर पूरी हो गई है, लेकिन हकीकत में नल सूखे हैं। घर के पास पाइपलाइन बिछा दी गई है, पर पाइप में पानी नहीं है। महिलाओं ने शिकायत की कि हमारे गले अभी भी सूखे हैं।
बिच्छुओं और सांपों का खतरा
महिलाएं सिर पर मटके और हाथ में घड़ा लेकर पानी लाने के लिए संघर्ष कर रही हैं। नागरिक डर के साए में हैं क्योंकि जंगल से पानी लाते समय सांपों और बिच्छुओं का खतरा हमेशा बना रहता है। मानसून में बारिश होने पर भी उन्हें पीने के लिए झरनों और तालाबों का ही गंदा पानी छानना पड़ता है।
तीन साल से बिजली नहीं
भोपलेवाड़ी गांव में जलजीवन योजना के तहत नल तो लगा दिए गए हैं, लेकिन नलों में पानी नहीं आ रहा है। जल जीवन योजना के लिए बिजली का कनेक्शन नहीं दिया गया है। ठेकेदार, ज़िला परिषद और महावितरण से तीन साल तक संपर्क करने के बावजूद ग्रामीणों को मीटर नहीं मिला है। नतीजतन मोटर चालू न होने से पानी की आपूर्ति बाधित है।
