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संपादकीय : कांग्रेस से क्या जवाब मांग रहे हो?

प्रधानमंत्री मोदी एक अथाह अबूझ व्यक्तित्व हैं। स्वयं समस्याएं खड़ी करना और फिर उन समस्याओं से खुद को आजाद कर, ठीकरा कांग्रेस पर फोड़ना यही काम वे पिछले ११ वर्षों में करते रहे हैं। दुनिया में शायद ही कोई दूसरा ऐसा असफल प्रधानमंत्री हुआ हो, लेकिन लोगों को धर्म और जाति की अफीम खिलाकर उन्होंने इस तरह मदहोश कर दिया है कि ऐसी हालत में भी लोग प्रधानमंत्री मोदी के भजन गाते रहते हैं। कांग्रेस ने देश के स्वतंत्रता संग्राम में राष्ट्रीय एकता बनाए रखने में, बल्कि आज के भारत के निर्माण में योगदान दिया है। इन सबकी वजह से प्रधानमंत्री मोदी के पेट में भयानक दर्द उठाता है और कांग्रेस के लिए घृणा का ज्वार उमड़ता है। मोदी पहलगाम पर बात नहीं करते, राष्ट्रपति ट्रंप की दम-डाटी पर चुप रहते हैं, किसके दबाव में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ वापस लिया गया? वे इस सवाल का जवाब नहीं देते, लेकिन कांग्रेस को पानी पी-पीकर कोसते रहते हैं। कुल मिलाकर, मोदी कांग्रेसमय बन चुके लगते हैं। उनका एकालाप कार्यक्रम यही है कि देश में अब तक जो भी बुरा हुआ है, वह सिर्फ और सिर्फ कांग्रेस की वजह से हुआ है। मोदी सोमवार को अरुणाचल प्रदेश के दौरे पर थे। वहां उन्होंने ५,१२५ करोड़ रुपए की बुनियादी ढांचा परियोजनाओं का भूमिपूजन किया। बाद में ईटानगर में एक सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, ‘कांग्रेस ने कभी बड़े विकास कार्य करने का साहस नहीं दिखाया। यह उनकी पुरानी आदत है। इसी वजह से पूर्वोत्तर भारत को नुकसान उठाना पड़ा।’ वे यहीं नहीं रुके। भाजपा सरकार के
इस नजरिया बदलने से
अब, वहां सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहे हैं, ऐसा कहते भी उन्होंने खुद की पीठ थप-थपाई। पूर्वोत्तर के राज्य भारत की एकता और अखंडता की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील राज्य हैं। इन्हें ‘सेवन सिस्टर्स’ कहा जाता है। मोदी का कहना है कि कांग्रेस ने इन राज्यों और इनके बुनियादी ढांचे के विकास की अनदेखी की, जबकि उनकी सरकार ने ध्यान दिया। इसे मोदी का मजाक ही कहा जाना चाहिए। अगर मोदी ने सचमुच इस क्षेत्र पर ध्यान दिया होता, तो मणिपुर जैसा राज्य दो-तीन सालों तक सांप्रदायिक हिंसा की आग में न झुलसता। हालांकि, इसके पीछे दो समुदायों, मैतेई और कुकी के बीच हिंसक संघर्ष था फिर भी अगर मोदी सरकार ने समय रहते ध्यान दिया होता, तो यह हिंसा की आग नहीं भड़कती। खैर, मणिपुर में बीरेन सिंह के नेतृत्व में भाजपा का शासन था। इसलिए, यह कहने की कोई गुंजाइश नहीं है कि मोदी ने मणिपुर में सांप्रदायिक हिंसा को सिर्फ इसलिए नजरअंदाज कर दिया क्योंकि वहां विपक्षी दलों की सरकार है। इसके विपरीत, यह तथ्य कि राज्य में अपनी ही पार्टी की सरकार होने के बावजूद मोदी ने प्रधानमंत्री रहते हुए इसे नजरअंदाज किया, ज्यादा गंभीर है। मोदी वहां खूनी हिंसा को बस देखते रहे। हिंसा को कम करने की कोशिश तो दूर, इसे कम करने की मोदी सरकार की मानसिकता भी पिछले तीन सालों में दिखाई नहीं दी। जिस तरह रोम जल रहा था, तब नीरो बांसुरी बजाता रहा, उसी तरह मणिपुर तीन साल तक सांप्रदायिक आग में जलता रहा और मोदी
आराम से दिल्ली में
बैठे अपनी दाढ़ी पर हाथ फेर रहे थे। विपक्षी दलों से लेकर मणिपुर के ओलिंपिक पदक विजेता खिलाड़ियों तक, सभी ने मोदी से मणिपुर जाकर वहां के हिंसा प्रभावित लोगों से मिलने, उनसे बातचीत करने और उन्हें राहत पहुंचाने का अनुरोध किया। लेकिन मोदी ने उनकी ओर पलट कर तक नहीं देखा। मणिपुर का प्रत्यक्ष दौरा तो दूर, उन्होंने संसद में भी इस बारे में सिर्फ दो मिनट ही बात की। इसे पूर्ण उपेक्षा नहीं तो और क्या कहें? मोदीजी, मणिपुर भी पूर्वोत्तर का एक महत्वपूर्ण राज्य है। अगर आपने समय रहते ध्यान दिया होता, तो वहां के मैतेई और कुकी समुदाय एक-दूसरे से पूरी तरह अलग नहीं होते। उस राज्य का सामाजिक सौहार्द और भाईचारा खत्म नहीं होता। तीन साल तक इससे मुंह मोड़ने के बाद आपने १३ सितंबर को मणिपुर का एक दिवसीय दौरा किया और अपनी उपेक्षा का परिमार्जन करने की कोशिश की। लेकिन आपके मुंह मोड़ते ही वहां फिर से हिंसा भड़क उठी। कांग्रेस के जमाने में पूर्वोत्तर का कोई भी राज्य इतनी भयानक सांप्रदायिक आग में नहीं झुलसा था। इसलिए कांग्रेस से जवाब मांगने के बजाय, मणिपुर तीन साल तक क्यों जलता रहा? अरुणाचल प्रदेश की सीमा पर चीन गांव वैâसे बसा पाया? उस देश ने वहां कई गांवों के नाम बदल दिए, आप चुप क्यों रहे? क्या चीन ने आपकी नाक के नीचे लद्दाख-गलवान से लेकर अरुणाचल तक घुसपैठ नहीं की? त्रिपुरा से लेकर असम तक सभी राज्य अभी भी अशांत क्यों हैं? पहले देश की जनता को इन सवालों के जवाब दीजिए। कांग्रेस से क्या जवाब मांग रहे हो?

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