सैयद सलमान, मुंबई
फिलिस्तीन का सवाल एक बार फिर अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में है। इजरायल-हमास संघर्ष ने जहां मानवीय असंवेदनशीलता दिखाई, वहीं दुनिया की कई ताकतों को अपने रुख पर पुनर्विचार के लिए मजबूर कर दिया। दशकों से इजरायल के करीबी माने-जानेवाले ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों का अचानक फिलिस्तीन को मान्यता देना महज औपचारिक कदम नहीं है। यह गाजा की त्रासदी से पैदा हुए दबाव और नैतिक चुनौती की प्रतिध्वनि है। लंबे समय से इजरायल के सबसे करीबी सहयोगी माने-जानेवाले ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने अचानक फिलिस्तीन को मान्यता देकर एक बड़ा संदेश दिया है। यह पहली बार है जब जी-७ समूह के किसी सदस्य ने फिलिस्तीन को औपचारिक मान्यता दी है। प्रâांस का पैâसला भी चौंकानेवाला ही कहा जा सकता है। संभव है कि आनेवाले दिनों में कतार में खड़े कई और देश भी इस कूटनीतिक रुख को अपनाएं।
वादा?
अब तक १५० देश फिलिस्तीन को मान्यता दे चुके हैं। पुर्तगाल और भारत जैसे अन्य कई देश पहले ही फिलिस्तीन की मान्यता में शामिल हो चुके हैं। भारत की बात करें तो आश्चर्य है कि पिछले कुछ वर्षों में नई दिल्ली का झुकाव अधिकतर इजरायल की तरफ दिखता रहा। लेकिन हाल ही में संयुक्त राष्ट्र महासभा में टू-स्टेट सॉल्यूशन पर भारत ने अपने वोट से यह स्पष्ट कर दिया कि उसका मूल रुख आज भी सत्य और न्याय पर आधारित है।
दरअसल, इजरायल-फिलिस्तीन विवाद की जड़ें एक सदी से भी पुरानी हैं। १९१७ के बेलफोर घोषणा पत्र में यहूदियों को ‘नेशनल होम’ देने का वादा था। लेकिन उसी वादे में यह भी लिखा गया था कि मौजूदा आबादी के हितों को ठेस नहीं पहुंचेगी। इस वादे का हश्र हम आज तक देख रहे हैं। एक आबादी ने तो राष्ट्र के रूप में अपनी पहचान बना ली, लेकिन दूसरी बगैर किसी संप्रभु पहचान के अब भी बिखरी हुई है। १९४८ में इजरायल अस्तित्व में आया और अरब आबादी को उसके घर से विस्थापित कर दिया गया। यहीं से दो राष्ट्र समाधान का विचार जन्मा। पर यह समाधान अब तक नजरअंदाज होता रहा और इसकी कीमत आम लोग, विशेषकर फिलिस्तीनी अपने खून से अदा करते रहे हैं।
न्याय और मानवता
आज हालात ये हैं कि गाजा की तबाही ने पूरी दुनिया को झकझोर दिया है। हमास-इजरायल युद्ध शुरू होने के बाद से अब तक पैंसठ हजार से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं और इनमें भारी संख्या आम नागरिकों की है। मलबे के नीचे दबे बच्चों और भूख से तड़पते परिवारों की तस्वीरें मानवता के लिए कलंक बनकर हर दिन सामने आ रही हैं। लाखों लोग अपने घरों से उजड़ चुके हैं। दूसरी ओर इजरायल का नया ग्राउंड एक्शन हालात को और भयावह बनाने की ओर बढ़ रहा है। यही कारण है कि अमेरिका जैसे महाशक्ति सहयोगी के दबाव के बावजूद कई देश अब अपनी पुरानी नीतियों की समीक्षा करने को मजबूर हुए हैं।
यह बदलाव यूं ही नहीं आया। विश्व जनमत अब स्पष्ट रूप से फिलिस्तीन के साथ खड़ा होता दिख रहा है। यूरोप से लेकर अरब जगत तक एक बड़ी सहानुभूति की लहर है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरस ने भी कहा कि राष्ट्र का दर्जा फिलिस्तीनियों का अधिकार है, पुरस्कार नहीं। यह महज एक बयान न होकर वैश्विक राजनीति के बदलते परिदृश्य का आईना है। यह इस तथ्य की ओर भी इशारा करता है कि विश्व राजनीति में स्थायी दोस्ती और दुश्मनी से ज्यादा बड़ा प्रश्न न्याय और मानवता है।
आत्ममंथन!
ऐसी स्थिति में फिलिस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास की अपील भी मायने रखती है। उनका कहना है कि हमास और उसके गुटों को न केवल हिंसा का रास्ता छोड़ना होगा, बल्कि हथियार भी फिलिस्तीनी प्राधिकरण के हवाले करने होंगे। गाजा में शासन और सुरक्षा की जिम्मेदारी फिलिस्तीनी राष्ट्र को ही संभालनी चाहिए, अन्यथा यह समर्थन भी अधूरा ही साबित होगा। संघर्ष चाहे कितना भी पुराना क्यों न हो, हर दौर में संवाद के अवसर भी मिलते हैं। गाजा की तबाही ने जिस तरह से अंतरराष्ट्रीय जमीर को जगाया है, वह एक नए आरंभ का संकेत हो सकता है। लेकिन तभी, जब हिंसा थमे, बंधक रिहा हों और सभी पक्ष मान लें कि हथियार से कोई समाधान पैदा नहीं होगा। न्याय, संवाद और समान अधिकार ही वह मार्ग है, जो इस रक्तरंजित विवाद को अंतत: खत्म कर सकता है। इतिहास ने कई बार दिखाया है कि हर संकट अपने साथ एक अवसर भी लाता है। दुनिया का झुकाव आज फिलिस्तीन के हक में पहले से कहीं अधिक है। यह वक्त फिलिस्तीन के लिए पहचान और अधिकार सुनिश्चित करने और इजरायल समेत उसके सहयोगियों के लिए आत्ममंथन का है। सवाल केवल सीमाओं का नहीं, बल्कि उस इंसानी गरिमा का है, जिसके बिना शांति नामुमकिन है।
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक और देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)
