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सरसंघचालक मोहन भागवत का तर्क…हिंदू धर्म पंजीकृत नहीं, तो संघ को पंजीकरण की जरूरत क्या है?

सामना संवाददाता / मुंबई

दुनिया में कई चीजें ऐसी हैं जो पंजीकृत नहीं हैं। हिंदू धर्म भी पंजीकृत नहीं है तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का पंजीकरण जरूरी क्यों हो? इस तरह का तर्क सरसंघचालक मोहन भागवत ने कल दिया। वे आरएसएस के १०० वर्ष पूरे होने पर आयोजित कार्यक्रम में बोल रहे थे।
हाल ही में कांग्रेस नेताओं ने सवाल उठाया था कि आरएसएस आज तक पंजीकृत क्यों नहीं है? उसी पर उत्तर देते हुए भागवत ने कहा कि संघ की स्थापना १९२५ में हुई थी, जब ब्रिटिश राज था। क्या हमें उस समय ब्रिटिश सरकार के पास जाकर पंजीकरण करवाना चाहिए था? स्वतंत्रता के बाद भी कानूनन पंजीकरण का कोई अनिवार्य प्रावधान नहीं था। भागवत ने आगे कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व्यक्तियों का संगठन है। व्यक्तियों के संगठन को कानूनी मान्यता प्राप्त होती है। उस आधार पर हम भी मान्य हैं। उन्होंने कहा कि संघ पर तीन बार प्रतिबंध लगाया गया था। अगर हमारी मान्यता न होती तो प्रतिबंध लगाया ही नहीं जा सकता था। हमारे ऊपर लगाए गए सभी प्रतिबंध अदालत में कभी टिके ही नहीं। आईटी विभाग ने भी हमें संगठन के रूप में मान्यता दी है और संघ को आयकर में छूट भी प्राप्त है। इसका अर्थ यही है कि हमें कानूनी मान्यता मिली हुई है। आरएसएस कोई संविधान विरोधी संगठन नहीं है इसलिए हमने अब तक कोई पंजीकरण नहीं करवाया है।

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