राजनीतिक सत्ताधारी खुद ही रोज अपने किसान प्रेम का पर्दाफाश कर रहे हैं। अब इसमें राज्य के जलसंपदा मंत्री और भाजपा नेता राधाकृष्ण विखे-पाटील का नाम भी जुड़ गया है। पंढरपुर में एक कार्यक्रम में इन महाशय ने कहा, ‘ये लोग सोसायटी बनाते हैं, कर्ज लेते हैं। फिर उसे माफ करवाते हैं और फिर कर्जमाफी की मांग करते हैं और ये तो कई सालों से चल रहा है।’ राधाकृष्ण विखे-पाटील के ये सुवचन न सिर्फ किसानों को अपमानित करनेवाले हैं, बल्कि सत्ताधारी दल के झूठ को भी फिर से सामने ला रहे हैं। विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान इन्हीं लोगों ने कर्जमाफी के वादे किए थे, लेकिन चुनाव जीतने के बाद इनके मुंह सिल दिए गए। कर्जमाफी के ‘क’ बोलने में झिझकने वाली इनकी जुबान किसानों का मजाक उड़ाते हुए हाथ भर लंबी हो जाती है। जलसंपदा मंत्री राधाकृष्ण विखे-पाटील ने भी यही किया। सही है, वे किसान कहां हैं? ये तो सहकारिता सम्राट हैं तो फिर वे आम कर्जदार किसानों, कर्ज के कारण आत्महत्या करनेवाले किसान परिवारों की दर्द व दुर्दशा कैसे समझ सकते हैं? किसानों की पूरी कर्जमाफी की उम्मीद बिल्कुल भी अनुचित नहीं है। खरीफ हो या रबी, हर साल
मनमानी प्रकृति
उनके हाथ में जो फसल होती है, उसे वह छीन लेती है। अक्सर, दोहरी बुवाई भी बर्बाद हो जाती है। इससे उसके कर्ज का पहाड़ बढ़ता ही जाता है। ऐसे में सरकारी मुआवजा या फसल बीमा राशि ‘भीख नहीं, कुत्ते को संभालो’ जैसी होती है। इस बीच, राज्य सरकार ने बाढ़ प्रभावित किसानों के लिए कुछ हजार करोड़ के ‘पैकेज’ का आंकड़ा दिखाया है, लेकिन उन हजारों करोड़ में से ‘कुछ सौ’ भी किसानों तक नहीं पहुंचे हैं इसलिए संपूर्ण कर्जमाफी ही एकमात्र उपाय बचा है। फिर यह कर्जमाफी कोई हुक्मरानों का उपकार नहीं है। यह किसानों की जरूरत है और जनता के अन्नदाता होने के नाते यह उनका अधिकार भी है। विखे-पाटील जैसे शासक वर्ग उस जरूरत पर भी विचार नहीं करते और ऋण माफी के अधिकार से भी इनकार करते हैं। हालांकि, उनके अपने चीनी कारखाने सरकारी पूंजी से स्थापित होते हैं। बाद में कुप्रबंधन और भ्रष्टाचार के कारण, वे मुश्किल में पड़ जाते हैं। इसके लिए ये वर्ग सरकार से फिर से ऋण लेते हैं। फिर भी, कारखाने बंद पड़ ही जाते हैं। फिर ये ही वर्ग इन बंद चीनी कारखानों को कौड़ी के मोल खरीद लेते हैं। इन्हें चलाने के लिए वे सरकार से हजारों करोड़ रुपए उधार भी लेते हैं। जिन किसानों के नाम पर राजनेताओं ने चीनी मिलें शुरू कीं, वे
सभी साखर (चीनी) सम्राट
बन गए। फिर वे उसी के आधार पर वे शिक्षा सम्राट वगैरह बन गए। इसी आधार पर राजनीति और सत्ता में उनकी फसल फलती रही है, लेकिन जिस साधारण गन्ना उत्पादक के नाम पर यह सब हुआ, वह आज भी वहीं है। उनके गन्ने का उचित मूल्य आज भी नहीं मिलता। अगर मिलता तो न तो वे कोई सोसायटी बनाते, न कर्जदार बनते, न ही विखे-पाटील जैसे लोग कर्जमाफी पर उनका मजाक उड़ाने की हिम्मत जुटा पाते। राज्य में सत्ताधारी केवल ५०० रुपए की स्टांप ड्यूटी देकर १,८०० करोड़ रुपए की जमीन हथियाने की कोशिश कर रहा है। वही उप मुख्यमंत्री ‘सब कुछ मुफ्त में और हमेशा माफ कैसे किया जा सकता है?’ जैसे शब्दों से किसानों का अपमान करते हैं। मुख्यमंत्री कर्जमाफी को ‘तारीख दर तारीख’ बताकर किसानों के जख्मों पर नमक छिड़क रहे हैं। उनके अपने जलसंपदा मंत्री ‘पहले कर्जदार बनते हैं और फिर से कर्जमाफी की मांग करते हैं’ कहकर उन जख्मों पर की पपड़ी कुरेदते हैं। राधाकृष्ण विखे-पाटील का यह जहर बहुत ही भयानक है तो अगर एक नाराज, गरीब, कर्ज में डूबा किसान, किसान नेता बच्चू कडू की ‘विखे-पाटील की कार तोड़ने और एक लाख रुपए का इनाम पाने’ की पेशकश स्वीकार कर ही ले तो उसे दोषी कैसे कहा जा सकता है?
