एम. एम. एस.
देश के करोड़ों मेहनतकशों की बदहाल जिंदगी को और भी तबाह करनेवाले चार खतरनाक कानून यानी चार लेबर कोड को बीते २१ नवंबर को मोदी सरकार सरकार ने लागू कर दिया है। इन चार लेबर कोड के लागू होने के बाद मजदूरों के बचे-खुचे अधिकारों को भी छीन लिया गया है, जिन्हें दशकों के संघर्ष के बाद हासिल किया गया था।
ये संहिता २०१९ और सितंबर २०२० में संसद द्वारा पारित की गई थीं, जब देश कोरोना‑लॉकडाउन की कठिनाइयों से जूझ रहा था। इन कानूनों को लागू करने के पीछे सरकार का उद्देश्य श्रम बाजार को ‘असरदार’ बनाना बताया गया है, जबकि कई ट्रेड यूनियन और सामाजिक समूह इनसे मजदूरों के अधिकारों के क्षरण की आशंका जताते हैं, क्योंकि यह सरकार निजीकरण और ठेकाकरण लागू कर रही है, वह दिन दूर नहीं जब बची-खुची नौकरियां भी खत्म कर दी जाएंगी और आनेवाली पीढ़ी के लिए संगठित क्षेत्र में भी रोजगार नहीं बचेगा।
चार संहिताएं
१. मजदूरी श्रम संहिता- न्यूनतम वेतन की अनिवार्यता को कम करने, ८ घंटे से अधिक काम के लिए ओवरटाइम वेतन न देने जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं। अब मालिक १२ घंटे भी काम करा सकता है।
२. व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यस्थल स्थिति संहिता-केवल १० से अधिक कर्मचारियों वाले प्रतिष्ठानों पर लागू होती है, जिससे असंगठित श्रमिकों का बड़ा हिस्सा इस दायरे से बाहर रह जाता है।
३. सामाजिक सुरक्षा व पेशागत सुरक्षा संहिता-ईएसआई, पीएफ, ग्रेच्युटी, पेंशन, मातृत्व लाभ आदि को केंद्र या राज्य सरकार के नोटिफिकेशन पर निर्भर बनाती है, जिससे इन लाभों की अनिवार्यता कम हो जाती है। अधिकतर नौकरियां ठेकेदारों को सौंप दी जाएंगी और ठेकेदारों को इन चीजों से कोई लेना देना नहीं।
४. औद्योगिक संबंध संहिता- रोजगार सुरक्षा में मालिक की जिम्मेदारी घटाती है। ३०० से कम कर्मचारियों वाले कारखानों में लेऑफ या छंटनी के लिए सरकारी अनुमति की आवश्यकता नहीं रहती (पहले यह सीमा १०० थी)। हड़ताल के लिए ६० दिन का नोटिस अनिवार्य किया गया है और ठेकेदारी प्रथा को कानूनी मान्यता दी गई है। यहां पर मैनेजमेंट यदि यूनियन से बातचीत कर रहा है तो नोटिस पीरियड बीतने के बाद नोटिस निरस्त मानी जाएगी।
समर्थन और विरोध
सरकार इन संहिताओं को ‘व्यवसाय करने में आसानी’ और ‘श्रम बाजार को लक्षित रूप से सुधारने’ के रूप में देखती है। दूसरी ओर ट्रेड यूनियन, सामाजिक कार्यकर्ता और कुछ राजनीतिक दल इनको श्रमिकों के हितों के विरुद्ध मानते हैं और इनके खिलाफ आंदोलन जारी रखने की बात कहते हैं।
इन संहिताओं के लागू होने के बाद श्रमिकों की स्थिति, उनके अधिकारों की उपलब्धता और सामाजिक सुरक्षा के भविष्य को लेकर बहस भले ही शुरू हो गई हो, लेकिन इन बहसों का कोई असर सरकारी रवैया पर पड़ेगा इस बात की गारंटी शून्य है, क्योंकि आज का सफेद कॉलर मजदूर इन बहसों का हिस्सा बनेगा यह चांद-तारे तोड़ने जैसी बात है दूसरी ओर मजदूर यूनियनों को लगभग खत्म कर दिया गया है। हड़ताल जैसी बातें अब बीते दिनों की बात हो गई हैं।
