सूफी खान
इस्लामिक रिपब्लिक ईरान में मस्जिदों और सरकार के बीच खींचतान बढ़ती जा रही है। हालात ये हैं कि अब ईरान के प्रेसिडेंट ने भी मस्जिदों के प्रबंधन को निशाने पर लिया है। ईरानी प्रेसिडेंट मसूद पजेश्कियान ने देश की ८० हजार मस्जिदों पर ढंग से काम न करने का इल्जाम लगाया है। ईरान के प्रेसिडेंट पजेश्कियान ने दो टूक कहा है कि अगर मस्जिदों के आलिमे दीन अपनी जिम्मेदारी ठीक से निभा लें तो ईरान की सूरत ही बदल जाए।
ईरानी प्रेसिडेंट के मुताबिक, मस्जिदें और उनके मौलवी समाज या आम जनता के लिए कुछ भी ठोस नहीं कर रहे हैं, बल्कि सरकारी आदेशों के आधार पर सिर्फ बयान जारी कर रहे हैं।
गौरतलब है कि ईरान एक शिया मुस्लिम अक्सरियत वाला मुल्क है। यहां मस्जिदों को सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक रूप से बहुत महत्व दिया जाता है। ईरान के आलिमे दीन सिर्फ मजहबी रहनुमा ही नहीं, बल्कि राजनीतिक पैâसलों में भी भूमिका निभाते हैं। यहां तक कि ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई भी कई मुद्दों पर मौलवियों की राय लेते हैं।
ऐसे में ईरान के राष्ट्रपति का कहना है कि मस्जिद के मौलवी सिर्फ सरकार के लिए फरमान जारी करते हैं, खुद कुछ नहीं करते हैं। मीडिया में प्रेसिडेंट मसूद पजेश्कियान ने कहा, ‘अगर सरकार काम नहीं कर रही तो मस्जिदों के मौलवी क्या कर रहे हैं?, मस्जिदें लोगों की भलाई के लिए होती हैं, सिर्फ भाषण और फरमान सुनाने के लिए नहीं’ उन्होंने आगे कहा कि अगर देश की हर मस्जिद सिर्फ एक-एक परिवार की जिम्मेदारी ले ले, तो ईरान की सामाजिक और आर्थिक तस्वीर बदल सकती है।
मीडिया रिपोर्ट बता रही हैं कि इस बयान के बाद ईरान की राजनीति गरमा गई है। पेजेश्कियान एक प्रोग्रेसिव लीडर माने जाते हैं। ईरान के प्रेसिडेंट इलेक्शन में भी उनकी यही छवि काम कर गई थी। जबकि मस्जिदों में बैठे मौलवी और धार्मिक तबका कट्टरपंथी खेमे से माना जाता है। कई मौकों पर कट्टरपंथियों ने उनसे इस्तीफा मांगते हुए कहा था कि वे इस्लामी व्यवस्था के खिलाफ हैं।
पिछले साल जून में जब ईरान की गर्जियन काउंसिल ने राष्ट्रपति उम्मीदवारों की सूची को अंतिम रूप दिया तब भी प्रोग्रेसिव या सुधारवादियों के अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद कम ही थी। काउंसिल ने छह उम्मीदवारों के नाम पर मुहर लगाई, जिसमें एक नाम मसूद पेजेश्कियान का भी था। वे एकमात्र ऐसे शख्स थे, जिनका राजनीतिक नजरिया सिद्धांतवादियों से मेल नहीं खा रहा था। लेकिन उन्हे भरपूर समर्थन मिला और वो ईरान के राष्ट्रपति चुने गए।
जबकि ईरान में दूसरा वर्ग है जो कट्टर इस्लामी विचारधारा का समर्थन करता है। कहा जाता है कि ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई भी इसी खेमे से आते हैं। यही वजह है कि इस्लामी रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स कॉप्स यानी आईआरजीसी सुधारवादियों की तुलना में सिद्धांतवादियों के ज्यादा करीब हैं। ऐसे में सुधारवादी राष्ट्रपति मसूद पजेश्कियान ने न सिर्फ अपने खिलाफ चुनाव लड़ रहे सईद जलीली को हराया था बल्कि इसी मुद्दे पर उन्हें अवाम का सपोर्ट भी मिला। यही वजह है कि पजेश्कियान ने मस्जिदों के मौलानाओं को निशाने पर ले लिया है। अब देखना होगा उनके इस रुख का आगे आने वाले दिनों में ईरान की सियासत पर क्या असर होता है।
ईरान के प्रेसिडेंट पजेश्कियान ने यह भी कहा कि उनकी सरकार मुश्किल हालात में काम कर रही है। उनके पद संभालते ही हमास के कमांडर इस्माइल हानिया की मौत ईरान में ही हुई, ईरान-इजराइल तनाव और फिर १२ दिनों का भयंकर युद्ध। अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों के कारण स्थिति और जटिल हो गई है। उन्होंने साफ कहा कि ऐसी परिस्थितियों में सरकार सब कुछ अकेले नहीं कर सकती, इसलिए मस्जिदों को भी सामाजिक जिम्मेदारी निभानी चाहिए।
