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रिपोर्टर डायरी : शहर जंगल में सांस लेने आया…

जेदवी

संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान की ओर जाने वाले रास्तों पर वही ट्रैफिक था, लेकिन वजह रोजमर्रा की नहीं थी। यह भीड़ सुकून की तलाश में निकली थी। बोरिवली- पश्चिम के इस हरियाली भरे जंगल में साल के आखरी दिन को यादगार बनाने के लिए सैकड़ों मुंबईवासी परिवार के साथ पहुंचे। प्रवेश द्वार पर लगी लंबी कतारें खुद गवाही दे रही थीं कि शहर आज अपनी भागदौड़ से छुट्टी पर है।
उद्यान के भीतर कदम रखते ही महसूस हुआ कि यहां वक्त की रफ्तार अलग है।
कहीं दादा-दादी अपने पोते-पोतियों का हाथ थामे सुगंधित उद्यान और गांधी टेकरी की ओर बढ़ रहे थे, तो कहीं माता-पिता बच्चों को कन्हेरी गुफाओं और प्रकृति सूचना केंद्र के किस्से समझा रहे थे। बस से होने वाली बाघ सफारी में बैठे चेहरों पर जहां रोमांच साफ दिख रहा था, वहीं निजी वाहनों पर रोक के चलते कई बुजुर्गों ने पैदल घूमने और बोटिंग में ही दिन का आनंद तलाश लिया।
युवा वर्ग के लिए ठंड कोई रुकावट नहीं बनी। किराए की साइकिलें लेकर वे हरे-भरे जंगल के बीच लंबा चक्कर लगाते दिखे, मानो साल की थकान पसीने के साथ उतर रही हो। दोपहर होते-होते पेड़ों की घनी छांव और झरने के पिकनिक की तस्वीरें उभर आर्इं। घर से लाया खाना, बच्चों की खिलखिलाहट और मोबाइल कैमरों में कैद होती यादें-हर प्रâेम में सादगी और सुकून था। लेकिन हर मुस्कान के बीच एक कमी भी महसूस हुई।
‘वनरानी’ ट्रेन के बंद रहने से कृष्णगिरी स्टेशन सूना पड़ा था। जिन बच्चों और पर्यटकों की उम्मीदें इस सवारी से जुड़ी थीं, उनके चेहरों पर मायूसी साफ झलक रही थी। यह खाली प्लेटफॉर्म भीड़ भरे जंगल के बीच एक अलग कहानी कह रहा था। दिन ढलते-ढलते यह साफ हो गया कि यह ३१ दिसंबर शोर, जश्न और देर रात की चकाचौंध के लिए नहीं था।
संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान में साल का आखरी दिन प्रकृति, परिवार और ठहराव के नाम रहा, जहां मुंबई ने एक दिन के लिए अपनी रफ्तार धीमी की और जंगल ने शहर को सिखाया कि नया साल शांति से भी शुरू किया जा सकता है।

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