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चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा-दादा गुट के बीच जमकर मारपीट!.. परभणी में भिड़े कार्यकर्ता, पुलिस तैनात

सुनील ओसवाल / मुंबई

महानगरपालिका चुनाव के बीच परभणी की राजनीति अचानक सड़क पर उतर आई। शहर के एक संवेदनशील इलाके में भाजपा और दादा गुट के कार्यकर्ताओं के बीच जमकर मारपीट हो गई। चुनावी सरगर्मी के बीच हुई इस भिड़ंत ने कुछ देर के लिए इलाके में तनाव पैâला दिया, जिसे पुलिस के हस्तक्षेप के बाद नियंत्रित किया गया।
प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, प्रभाग स्तर पर चुनावी तैयारियों और समर्थन को लेकर दोनों पक्ष आमने-सामने आए। पहले नारेबाजी हुई, फिर बहस तेज होती चली गई और देखते-देखते हाथापाई तक बात पहुंच गई। मौके पर मौजूद लोगों ने हालात बिगड़ते देख पुलिस को सूचना दी। पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए दोनों गुटों को अलग-अलग किया और भीड़ को तितर-बितर किया। घटना के बाद इलाके में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात कर दिया गया। यह टकराव ऐसे समय पर हुआ है, जब परभणी में महानगरपालिका चुनाव को लेकर राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। दावेदारी, गठजोड़ और समीकरणों की खींचतान ने स्थानीय स्तर पर तनाव बढ़ा दिया है। सत्ताधारी और सहयोगी खेमों के भीतर भी रणनीति को लेकर असमंजस की स्थिति बताई जा रही है, जिसका असर जमीनी कार्यकर्ताओं की आक्रामकता में दिख रहा है।
मुकाबला भाषणों तक सीमित नहीं
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि निकाय चुनावों में सत्ता की सीधी हिस्सेदारी और स्थानीय प्रभाव का सवाल होने के कारण टकराव की आशंका पहले से बनी रहती है। परभणी की घटना ने यह संकेत दिया है कि चुनावी मुकाबला अब केवल भाषणों और पोस्टरों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सड़कों पर ताकत आजमाइश की शक्ल लेने लगा है। विपक्षी दलों ने घटना को लोकतांत्रिक मर्यादाओं के खिलाफ बताया है, वहीं सत्तापक्ष के नेताओं ने शांति बनाए रखने की अपील की है।
संवेदनशील इलाकों में निगरानी
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि स्थिति फिलहाल नियंत्रण में है और किसी को गंभीर चोट की सूचना नहीं है। हालांकि, एहतियात के तौर पर संवेदनशील इलाकों में निगरानी बढ़ा दी गई है। प्रशासन ने साफ किया है कि चुनाव के दौरान कानून-व्यवस्था से खिलवाड़ करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। परभणी की यह घटना बताती है कि निकाय चुनाव के साथ-साथ राजनीतिक ध्रुवीकरण कितना तेज हो चुका है। आने वाले दिनों में प्रचार और तेज होगा, लेकिन सवाल यह है कि क्या राजनीतिक दल प्रतिस्पर्धा को लोकतांत्रिक दायरे में रख पाएंगे, या फिर चुनावी गर्मी ऐसे ही सड़कों पर उतरती रहेगी।

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