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दिल चाहता है से गली बॉय तक: कैसे एक्सेल एंटरटेनमेंट ने बदला भारतीय सिनेमा का चेहरा

हिमांशु राज़

रितेश सिधवानी और फरहान अख्तर की एक्सेल एंटरटेनमेंट हमेशा से हिंदी सिनेमा में एक ट्रेंडसेटर रही है। हाल ही में यूनिवर्सल म्यूज़िक ग्रुप के साथ उनकी साझेदारी ने न सिर्फ़ भारतीय कंटेंट को ग्लोबल पहुंच दी है, बल्कि इस बात का ऐलान भी किया है कि भारतीय कहानियाँ अब दुनिया भर में गूंजेंगी।पिछले पच्चीस वर्षों में एक्सेल ने जिस तरह भावनाओं, दोस्ती, संघर्ष और आत्म-खोज की कहानियों को परदे पर लाया, उसने दर्शकों की सोच और फिल्ममेकिंग के मानदंड दोनों बदले।‘दिल चाहता है’ (2001) ने हिंदी फ़िल्मों के शहरी परिदृश्य को फिर से परिभाषित किया। यह सिर्फ़ तीन दोस्तों की कहानी नहीं थी, बल्कि एक नई पीढ़ी की मानसिकता का परिचय था। दोस्ती और रिश्तों को आधुनिक नज़रिए से दिखाते हुए यह फ़िल्म कल्ट क्लासिक बन गई।‘लक्ष्य’ (2004) ने आत्म-साक्षात्कार की कहानी को वॉर ड्रामा के साथ जोड़ा। हृतिक रोशन का किरदार आज भी युवा वर्ग के लिए प्रेरणा का प्रतीक है।‘ज़िंदगी ना मिलेगी दोबारा’ (2011) ने यात्रा और आत्म-खोज को उत्सव की तरह पेश किया। सुंदर लोकेशंस, कवितामयी संवाद और दोस्ती की सच्चाई — इस फ़िल्म ने आधुनिक युवाओं को निडर होकर जीने की प्रेरणा दी।‘गली बॉय’ (2019) ने भारतीय सिनेमा में एक नया रैप कल्चर स्थापित किया। धारावी से निकलते रैपर्स की आवाज़ बनकर यह फ़िल्म अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुँची।ओटीटी के युग में ‘मिर्ज़ापुर’ ने भी वही जादू दोहराया। देसी अपराध कथा और दमदार संवादों ने इसे घर-घर में चर्चित बना दिया।आज एक्सेल एंटरटेनमेंट सिर्फ़ फ़िल्में नहीं बनाता, बल्कि भारत की नई सांस्कृतिक पहचान गढ़ रहा है। मुंबई की गलियों से लेकर स्पेन की सड़कों तक — इसके हर प्रोजेक्ट ने यह साबित किया है कि सिनेमा अब मनोरंजन भर नहीं, बल्कि एक विचार है जो पीढ़ियों को जोड़ता है।

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