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गपशप : प्यार पर शक, घर पर पहरा और संवाद की तलाश!.. लव जिहाद, त्रिसूत्री और संस्कृति के स्वयंघोषित रखवाले

राजन पारकर

हमारे देश में एक बात तो निर्विवाद है। चाहे सवाल कितना ही जटिल क्यों न हो, उसका जवाब अक्सर तीन बिंदुओं में दे दिया जाता है। इसे हम ‘त्रिसूत्री’ कहते हैं। पहले मंत्र तीन पंक्तियों के होते थे, अब सवालों के जवाब भी तीन पंक्तियों में सिमट गए हैं! लव जिहाद जैसा अत्यंत संवेदनशील, सामाजिक, भावनात्मक और कानूनी उलझाव वाला विषय और उस पर समाधान क्या बताया जाता है?
घर में संवाद करें!
अरे, अगर संवाद ही सब कुछ होता, तो न देश में पुलिस की जरूरत होती, न अदालतों की, न संसद की और न ही इतने नेताओं की! संवाद की खोज देर से ही सही, पर हो गई! राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक कहते हैं। माता-पिता और बच्चों के बीच संवाद की कमी के कारण लव जिहाद जैसी घटनाएं होती हैं। यह आज पता चला? तो अब तक घर में संवाद की जगह क्या चलता था। गुप्त तरीके से पूछताछ क्या? आज अधिकांश घरों की संरचना कुछ ऐसी हो गई है कि पिता मतलब पूछताछ अधिकारी, मां मतलब सूचना विभाग और बच्चे मतलब हमेशा के संदिग्ध!
लड़की फोन पर बात करे तो किससे? लड़का हंसे तो किस बात पर? दोनों साथ बाहर जाएं तो किसकी अनुमति से? और फिर ऊंची आवाज में सवाल पुछे जाते हैं कि बच्चे हमसे संवाद क्यों नहीं करते? जहां संवाद होना चाहिए, वहां शक बोया जाता है। और फिर हैरानी जताई जाती है कि भरोसा क्यों खत्म हो गया!
लव जिहाद: हकीकत या डर की कहानी?
लव जिहाद शब्द ऐसा है कि उसे बोलते ही डर अपने आप होने लग जाता है। जैसे किसी फिल्म में भूत का नाम लिया और अचानक लाइट चली गई! इस विषय पर फिल्में बनीं, घोषणाएं हुर्इं, मोर्चे निकले और समाज इतना ध्रुवीकृत हो गया कि अब प्यार भी पहचान पत्र देखकर करने का सुझाव दिया जाता है! आचार्य अत्रे की भाषा में कहें तो जो समाज प्रेम में धर्म खोजता है, वह कल सांस में भी जाति ढूंढेगा!
लड़कियों के लिए सजगता या डर की शिक्षा?
बताया जाता है लड़कियों में सजगता होनी चाहिए, बिल्कुल होनी चाहिए! लेकिन सजगता का मतलब आंखें खुली रखना है, डर की पट्टी बांधना नहीं। आज सजगता के नाम पर लड़कियों को सिखाया जाता है। सबसे दूर रहो, सब पर शक करो और प्यार मतलब खतरा! तो सवाल उठता है कि धोखा धर्म के कारण होता है या इंसान को न पहचान पाने के कारण? अगर इंसान को पहचानना सिखाया जाता, तो धर्म बदलकर भी कोई धोखा नहीं दे पाता! कहते हैं कड़े कानून चाहिए, बिल्कुल चाहिए! लेकिन कानून धोखाधड़ी के लिए होते हैं, भावनाओं के लिए नहीं। अगर हर प्रेम कहानी पर कानून लगाना हो, तो अदालतों में मुकदमों से ज्यादा कविताओं का अंबार लग जाएगा! जो समाज प्यार को अपराध मानता है, वह कल सपनों से भी जमानत मांगेगा!
क्या महिला धर्म की तिजोरी है?
महिलाओं के कारण धर्म और संस्कृति सुरक्षित है, यह सुनने में बहुत मधुर लगता है। लेकिन अर्थ पर जाएं तो सवाल खड़ा होता है। कि क्या धर्म इतना कमजोर है कि उसे बचाने के लिए स्त्री के जीवन पर पहरा जरूरी है? अगर धर्म को बचाने के लिए स्त्री की स्वतंत्रता पर पाबंदी लगानी पड़े, तो वह धर्म संकट में नहीं, डर में है! और पुरुष? वे क्या करते हैं? संस्कृति की रक्षा या संस्कृति के नाम पर केवल भाषण? पश्चिमी समाज और भारतीय संस्कृति की तुलना बहुत सुविधाजनक होती है। क्योंकि तुलना करते समय हम अपनी कमियां अपने आप छिपा लेते हैं! जैसे दूसरों पर उंगली उठाते समय अपने घर का आईना जानबूझकर ढक दिया जाता है!
त्रिसूत्री नहीं, एकसूत्री इंसानियत!
इस देश को अब नई त्रिसूत्रियों की जरूरत नहीं है। जरूरत है तो एक सरल सूत्र की, इंसान से इंसान की तरह व्यवहार करने की! जहां संवाद होगा, वहां शक मर जाएगा। जहां भरोसा होगा, वहां डर भाग जाएगा और जहां भरोसा होता है, वहां कोई भी ‘जिहाद’ अपने आप निष्प्रभावी हो जाता है!

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