सुनील ओसवाल / मुंबई
महाराष्ट्र में जिला परिषद चुनावों में भले ही देरी हो रही है। पर इसकी तैयारी जारी है। ठाणे, पालघर, पुणे, नासिक जैसे जिलों में कई इच्छुक उम्मीदवार मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए तरह-तरह की रणनीतियां अपना रहे हैं। महिला मतदाताओं के लिए देवदर्शन यात्राएं, मराठी फिल्मों के विशेष शो, साड़ी वितरण जैसे कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। वहीं युवाओं को लुभाने के लिए क्रिकेट टूर्नामेंट और अन्य खेल प्रतियोगिताओं का सहारा लिया जा रहा है। इसके अलावा सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों को आर्थिक सहायता देना, वर्षांत पर ‘ओली-सूखी’ जैसी दावतों का आयोजन कर कार्यकर्ताओं और मतदाताओं से संपर्क बनाए रखना, अब आम बात हो गई है। महायुति के संभावित उम्मीदवार इस तरह के आयोजनों में आगे नजर आ रहे हैं।
बता दें कि महाराष्ट्र में जिला परिषद चुनावों में हो रही देरी ने ग्रामीण राजनीति की धड़कनें तेज कर दी हैं। ५० प्रतिशत आरक्षण से जुड़े न्यायालयीन विवाद के चलते चुनाव टलने का सीधा असर संभावित उम्मीदवारों पर पड़ रहा है। ऐसे में ये उम्मीदवार कार्यकर्ताओं और मतदाताओं को अपने पक्ष में बनाए रखने के लिए लगातार खर्च करने को मजबूर हैं। चुनाव की घोषणा से पहले ही दावेदारों की जेब पर बढ़ता बोझ ग्रामीण सियासत की मौजूदा बेचैनी को उजागर कर रहा है। ५० प्रतिशत आरक्षण और उससे जुड़े न्यायालयीन पेच के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में जिला परिषद और पंचायत समिति के चुनाव लंबे समय से टलते आ रहे हैं। चुनाव की घोषणा में हो रही देरी का सीधा असर इच्छुक उम्मीदवारों पर पड़ रहा है। स्थानीय निकायों के चुनावों की प्रक्रिया जहां शहरी क्षेत्रों में गति पकड़ चुकी है, वहीं ग्रामीण राजनीति का आधार मानी जाने वाली जिला परिषदें अब भी न्यायालयीन प्रक्रिया में उलझी हुई हैं।
