सूरज सिंह
थाईलैंड की एक आपराधिक अदालत ने उसे पास पोर्ट के आधार पर पाकिस्तान भेज दिया था। यह वही मुन्ना झिंगाड़ा है, जिसने उत्तर प्रदेश के एक छोटे से कस्बे से निकलकर मुंबई की अंडरवर्ल्ड में अपनी पहचान बनाई और फिर दुबई, थाईलैंड व पाकिस्तान तक दहशत का नेटवर्क पैâलाया। जांच एजेंसियों के मुताबिक, मुन्ना झिंगड़ा का आपराधिक सफर उत्तर प्रदेश से शुरू हुआ, लेकिन उसकी असली पहचान मुंबई के जोगेश्वरी इलाके में बनी। यहीं से वह दाऊद इब्राहिम और छोटा शकील के संपर्क में आया और डी-कंपनी का भरोसेमंद शूटर बन गया। तेजी से ऊपर चढ़ते हुए वह गिरोह के उन चुनिंदा गुर्गों में शामिल हो गया, जिन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ‘हिट’ के लिए इस्तेमाल किया जाता था।
वह सही मायने में छोटा शकील के इशारे पर ही काम करता था कई साल की प्लानिंग के बाद साल २००० में थाईलैंड में गैंगस्टर छोटा राजन पर हुए जानलेवा हमले का नेतृत्व मुन्ना झिंगाड़ा ने किया था। इस हमले ने भारतीय अंडरवर्ल्ड में एक नया मोड़ ला दिया था। थाई अदालत ने इस मामले में उसे दोषी ठहराया, पुलिस जांच में मुन्ना के पास एक पासपोर्ट मिला था, वह पासपोर्ट पाकिस्तान का था। सूत्रों की मानें तो मुन्ना झिंगड़ा का मामला भारत-पाकिस्तान के बीच सिर्फ अपराध तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह रस्साकशी व कूटनीतिक टकराव का विषय बन गया था।
भारत लगातार उसके प्रत्यर्पण की मांग करता रहा। वहीं पाकिस्तान उसे अपना नागरिक बताकर भारत लाने का विरोध करता रहा। जांच एजेंसियों का दावा है कि पाकिस्तान की कुख्यात खुफिया एजेंसी आईएसआई ने उसे बचाने के लिए उसके पाकिस्तानी नागरिक होने के दस्तावेज और पासपोर्ट तक तैयार कराए। पाकिस्तान के दावों को खारिज करने के लिए सीबीआई और विदेश मंत्रालय ने एक मजबूत और तथ्यात्मक डोजियर तैयार किया। इसमें शामिल थे- मुन्ना झिंगाड़ा के फिंगरप्रिंट, उसकी बेटी के जन्म और मृत्यु प्रमाण पत्र, परिजनों के डीएनए सैंपल, भारत में निवास प्रमाण, कॉलेज और शैक्षणिक दस्तावेज इन सभी सबूतों के आधार पर यह साबित किया गया कि मुन्ना झिंगाड़ा एक भारतीय नागरिक है।
१९९३ मुंबई ब्लास्ट में भूमिका का आरोप
जांच एजेंसियों के अनुसार, दाऊद और छोटा शकील के बेहद करीबी होने के कारण मुन्ना झिंगाड़ा को १९९३ के मुंबई में सिलसिलेवार धमाकों की साजिश में भी गहराई से शामिल माना जाता है। उस पर डी-गैंग के शीर्ष गुर्गों और पाकिस्तान में बैठे आकाओं के साथ सीधा संपर्क रखने के आरोप हैं।
२०१७ से चल रही थी सुनवाई
इस हाई-प्रोफाइल मामले की सुनवाई अप्रैल २०१७ से थाईलैंड की अदालत में चल रही थी। कई सालों तक चली कानूनी लड़ाई और अंतर्राष्ट्रीय दबाव के बाद आखिरकार थाई अदालत ने भारत के पक्ष में फैसला सुनाया।
भारत के लिए बड़ी सफलता
थाईलैंड अदालत का यह फैसला न सिर्फ भारत की जांच एजेंसियों की जीत है, बल्कि यह अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारत की कूटनीतिक मजबूती को भी दर्शाता है। लेकिन मुन्ना तो अपने आकाओं की गोद मे पाकिस्तान में, है फिलहाल तो मामला कागज पर ही है!
