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स्पॉटलाइट : गुड़ की मिठास कम करने की साजिश… किसानों को मकर संक्रांति का इंतजार

सुनील ओसवाल

बीते साल की तुलना में इस बार जिले में गुड़ बनाने वाली इकाइयों की संख्या कम है। उत्पादन भी घटा है। इसके बावजूद बाजार में मांग में कोई खास तेजी नहीं दिखाई दे रही। इसका सीधा असर कीमतों पर पड़ा है। कोल्हापुर में इस समय गुड़ के दाम प्रति क्विंटल ४,७०० से ४,९०० रुपए के बीच स्थिर बने हुए हैं। उत्पादन कम होने के बावजूद दाम न बढ़ना, स्थानीय गुड़ उत्पादकों के लिए चिंता का कारण बन गया है।
कोल्हापुर कृषि उपज बाजार समिति में उपलब्ध आंकड़े इस दबाव को और साफ करते हैं। अलग-अलग दर्जे के गुड़ की कीमतों में बहुत सीमित अंतर है। प्रथम दर्जे के गुड़ का औसत भाव लगभग ४,९०० रुपए, दूसरे दर्जे का ४,८०० रुपए, तीसरे दर्जे का ४,८५० रुपए और निचले दर्जे का गुड़ भी करीब ४,९०० रुपए प्रति क्विंटल के आसपास ही कारोबार कर रहा है। यानी गुणवत्ता के बावजूद कीमतें लगभग एक ही स्तर पर अटकी हुई हैं।
इस ठहराव की सबसे बड़ी वजह गुजरात और कर्नाटक से आने वाला गुड़ बताया गया है। गुजरात में चीनी कारखानों की संख्या सीमित होने के कारण वहां का बड़ा हिस्सा गुड़ उत्पादन की ओर जाता है। नवंबर और जनवरी के बीच गुजरात में बड़े पैमाने पर गुड़ बाजार में उतरता है। यह गुड़ तुलनात्मक रूप से सस्ते दामों पर उपलब्ध होने के कारण महाराष्ट्र, राजस्थान और मध्य प्रदेश के कई बाजारों में पहुंच रहा है। इसी का असर कोल्हापुर, सांगली और सातारा के पारंपरिक गुड़ बाजारों पर पड़ रहा है।
कर्नाटक का गुड़ भी कोल्हापुर के लिए चुनौती बन गया है। कोल्हापुर से पहले कर्नाटक में गुड़ निर्माण का सीजन शुरू हो गया, जिससे वहां का गुड़ पहले ही बाजार में उतर चुका है। कर्नाटक का गुड़ सस्ता पड़ने के कारण गुजरात के कई व्यापारी वहीं से खरीद कर आगे के बाजारों में भेज रहे हैं। इसका प्रतिकूल असर कोल्हापुर के गुड़ की मांग पर साफ दिखाई दे रहा है।
दक्षिण गुजरात में भी गुड़ उत्पादन का सीजन शुरू हो चुका है। सूरत, तापी, नवसारी, भरूच और नर्मदा जिलों में बड़े पैमाने पर गुड़ निर्माण चल रहा है। स्थानीय और राज्यस्तरीय मांग वहीं से पूरी हो जाने के कारण परंपरागत रूप से कोल्हापुर से जाने वाला गुड़ अब इन बाजारों में जगह नहीं बना पा रहा है।
इस पूरे परिदृश्य में सबसे अहम बात यह है कि मांग की कमी के बावजूद दाम गिर नहीं रहे, लेकिन बढ़ भी नहीं रहे। यानी बाजार जड़ हो चुका है। संकेत दिया गया है कि संक्रांति के बाद ही गुड़ बाजार में कुछ तेजी आने की उम्मीद की जा सकती है। तब तक व्यापारी और उत्पादक दोनों प्रतीक्षा की स्थिति में हैं।
स्पॉटलाइट यहीं टिकता है। कोल्हापुर का गुड़ गुणवत्ता में आज भी मजबूत है, लेकिन बाहरी राज्यों से आ रहे सस्ते गुड़ ने उसके बाजार को संकुचित कर दिया है। उत्पादन घटने के बावजूद अगर मांग नहीं बढ़ती, तो इसका सीधा बोझ गुड़ उत्पादक किसानों और निर्माताओं पर ही पड़ेगा।
कोल्हापुर के गुड़ की लड़ाई अब उत्पादन की नहीं, बाजार में टिके रहने की है और इस लड़ाई में किसान सबसे कमजोर कड़ी बनता जा रहा है।

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