राज्य के नगरपालिका चुनाव एक तमाशा बन गए हैं। विभिन्न नगरपालिकाओं में लगभग ७० नगरसेवक निर्विरोध निर्वाचित हुए हैं और वे सभी `निर्विरोध’ सत्ताधारी दल के हैं। भाजपा और शिंदे गुट के बीच निर्विरोध चुने जाने की मानो होड़ सी लगी हुई है। यह घिनौनी हरकत लोकतंत्र में पैदा हुई एक विकृति है। कल्याण-डोंबिवली, ठाणे, जलगांव, पनवेल, भिवंडी, धुले में निर्विरोध चुने गए लोगों की उपलब्धि क्या है? वे सामने के उम्मीदवारों के मुंह पर दो से पांच करोड़ रुपए के बंडल फेंक रहे हैं और उन्हें चुनाव से हटने पर मजबूर कर रहे हैं तथा निर्विरोध जीत का ढोल पीट रहे हैं। भाजपा दोमुंहे केंचुए की तरह बिलबिलाती और बातें कर रही है। यह नैतिकता और चरित्र की बातें करती है और सभी घोटालेबाजों को अपनी पार्टी में शामिल करके चुनाव जीतती है। कभी ईवीएम तो कभी वोट चोरी, लेकिन अब इसने एक नया `निर्विरोध’ फंडा शुरू कर दिया है। इसीलिए हम भाजपा को दोमुंहे केंचुए कहते हैं। २०१८ के पंचायत चुनावों में जब तृणमूल कांग्रेस ने बंगाल की लगभग ३४ प्रतिशत सीटों पर निर्विरोध जीत हासिल की थी, तब इसी भारतीय जनता पार्टी ने तांडव मचा दिया था। तृणमूल कांग्रेस द्वारा आतंक के बल पर निर्विरोध चुनाव जीतने को लोकतंत्र की हत्या बताते हुए पश्चिम बंगाल में आंदोलन शुरू किया गया था। भाजपा ने आरोप लगाया कि तृणमूल कांग्रेस के नेताओं ने सरकारी तंत्र का दुरुपयोग किया और राज्य के विभिन्न हिस्सों में विपक्षी दलों के उम्मीदवारों को नामांकन दाखिल करने से रोका तथा चुनाव आयोग ने `तृणमूल’ को लाभ पहुंचाने वाली भूमिका अपनाई। भाजपा ने लोकतंत्र की हत्या के खिलाफ जो भूमिका पश्चिम बंगाल में ली थी आज वह बिल्कुल उसके
उलट भूमिका
महाराष्ट्र में अपना रही है। फर्क सिर्फ इतना ही है कि पश्चिम बंगाल में भाजपा विपक्ष में थी और महाराष्ट्र में सत्ता में है। तृणमूल ने २०१८ में पश्चिम बंगाल में जो किया, भाजपा महाराष्ट्र में `निर्विरोध’ के नाम पर वही कर रही है, तो क्या अब उसे ऐसा एहसास नहीं हो रहा कि यह सब लोकतंत्र ही की हत्या है। वह दोमुंहे केंचुए की तरह व्यवहार कर रही है। वह पश्चिम बंगाल में संदिग्ध `निर्विरोध’ के मामले में सीधे सुप्रीम कोर्ट पहुंची। १६ हजार से अधिक ग्राम पंचायत निर्विरोध सीटों पर सुप्रीम कोर्ट ने आश्चर्य जताया था। ये याचिका भाजपा ने दायर की थी और सुप्रीम कोर्ट ने `निर्विरोध’ चुनाव पर सवालिया निशान लगाया था। अब भाजपा ने महाराष्ट्र के नगरपालिका चुनावों में भी `सवालिया निशान’ उठाने वाला, उसी तरह का `निर्विरोध’ वाला काम किया है। इस चुनाव में जिन्होंने अपना नाम वापस लिया और सत्ताधारी पार्टी को निर्विरोध चुने जाने का रास्ता बनाया, वे सब कायर हैं। उन्होंने अपनी वफादारी बेच दी। शहरों के मुताबिक, उनकी खरीद-बिक्री के रेट तय हुए। ठाणे में अपनी उम्मीदवारी वापस लेने वालों को ५ से ८ करोड़, कल्याण-डोंबिवली में ३ करोड़, पिंपरी-चिंचवड़, पुणे में २ करोड़, पनवेल में ३० लाख, भिवंडी में २० लाख दिए गए और धुले, जलगांव, अहिल्यानगर में यही कीमत १५ लाख रुपए थी। उम्मीदवारों के उम्मीदवारी वापस लेते ही पैसा उनके घर पहुंच गया, लेकिन जिस पार्टी ने उन्हें उम्मीदवार बनाया था, उनसे आवेदन वापस लेने के लिए उनकी साधारण अनुमति तक नहीं ली गई। दरअसल, सत्ताधारी पार्टी के लोगों का इस तादाद में निर्विरोध निर्वाचित होना मतदाताओं का अपमान और उनके साथ धोखाधड़ी है। कुछ जगहों पर तकनीकी गलतियों के कारण उम्मीदवारों का चुनाव निर्विरोध हो सकता है, लेकिन सत्ताधारी पार्टी ने जिस `बड़े पैमाने’ पर निर्विरोध चुनाव जीतने की कोशिश की, वह सरासर
लोकतंत्र की हत्या
है। असल में ऐसी हालत में कोई भी चुनाव निर्विरोध नहीं हो सकता। क्योंकि हर मतपत्र या ईवीएम पर `नोटा’ (NOTA) का बटन होता है। ‘None of The Above’ का मतलब है `इनमें से कोई भी उम्मीदवार नहीं’। इसलिए सभी को `एक ही खेत की मूली, मानते हुए हजारों मतदाता विरोध में `नोटा’ बटन दबा देते हैं। अगर `नोटा’ चुनने वाले मतदाताओं की संख्या इससे अधिक होती है, तो चुनाव रद्द कर दिया जाता है और दोबारा कराया जाता है। इसलिए अगर कानून का पालन किया जाएगा तो चुनाव आयोग निर्विरोध जीत को खारिज कर देगा। निर्विरोध चुने गए उन ७० नगरसेवकों को चुनाव में `नोटा’ का सामना करना पड़ेगा। इसलिए चुनाव कराना ही होगा। महाराष्ट्र के इतिहास में सबसे घिनौने और विकृत तरीके से नगरपालिका चुनाव चल रहे हैं। चुनाव आयोग, पुलिस प्रशासन, उम्मीदवार न केवल बिके हैं, बल्कि कुछ जगहों पर मतदाताओं की भूमिका भी संदिग्ध कही जा सकती है। पैसों की बारिश में मतदाता भी बह गए। महाराष्ट्र में सत्ताधारियों की मनमानी और व्यवस्था तंत्र का उन्माद चरम पर पहुंच गया है। महाराष्ट्र पहले कभी ऐसा नहीं था। अगर आप चुनाव होने से पहले ही जीत खरीदना चाहते हैं, तो चुनाव आयोग को बर्खास्त करके भविष्य में चुनाव ही मत करवाइए। ७० सीटों पर एक भी वोट नहीं पड़ा, फिर भी सत्ताधारी पार्टी ने वहां चुनाव जीत लिया। भाजपा और उसके सहयोगियों ने लोकतंत्र का माफियाकरण कर दिया है। जहां वोट चोरी नहीं हो सकी, वहां आतंक और पैसे के बल पर विपक्षी उम्मीदवारों को चुनाव से हटने के लिए मजबूर किया गया। यह भारतीय लोकतंत्र की बेहद शर्मनाक तस्वीर है। हर जगह वेगवान मुंबई के शिल्पकार के तौर पर `देवाभाऊ’ के होर्डिंग्स लगे हैं। अब कहना पड़ेगा कि वे वेगवान चुनाव भ्रष्टाचार के शिल्पकार हैं। महाराष्ट्र की प्रतिष्ठा और नैतिकता का पतन वेग से शुरू हो गया है!
