लोकमित्र गौतम
देश का एकमात्र कॉस्मोपोलिटिन शहर मुंबई महज कांक्रीट का जंगल नहीं है, बल्कि एक जीवित सांस्कृतिक भू-खंड है। यह शहर भारत की आर्थिक धड़कन है, पर इसकी अस्मिता मराठी से ही बनती है। भले कारोबारी जरूरतों के कारण इस शहर में उत्तर भारतीय शहरों की तरह हिंदी बोली जाती हो। ऐसे में भाजपा नेता कृपाशंकर का उत्तर भारतीयों से यह कहना कि महानगरपालिका के चुनाव में इतने ज्यादा नगरसेवक चुनिए कि मुंबई का महापौर उत्तर भारतीय समुदाय से ही हो, क्षेत्रीय अस्मिता पर गैरजरूरी आघात है। सवाल यह नहीं है कि कोई उत्तर भारतीय मुंबई का मेयर बनने में सक्षम है या नहीं? सवाल है कि क्या हर सक्षम व्यक्ति को हर तरह के सांस्कृतिक संदर्भों और प्रतीकों को पराजित करके अपना वर्चस्व कायम करना चाहिए? क्या यह सच्चा लोकतंत्र होगा? अगर वाकई मुंबई के स्थानीय मराठी और दूसरे भाषा-भाषी लोग भी हर हाल में किसी अद्भुत व्यक्तित्व को इस पद पर बिठाना ही चाहें, तब तो यह शहर और शहर के लोगों का बड़प्पन होगा। लेकिन गणितीय समीकरणों से सियासी सक्रियता के जरिए स्थानीय अस्मिता की अनदेखी करके उसके हिस्से का नेतृत्व छीन लेना लोकतंत्र का कतई सम्मान नहीं होगा। इसी बिंदु पर कृपाशंकर का उत्तर भारतीयों से कहना कि ऐसी संख्यात्मक स्थिति खड़ी करिए कि मुंबई मराठी महापौर से वंचित हो जाए, सही नहीं होगा।
प्रशासनिक पद!
मुंबई देश का अकेला कॉस्मो सिटी माना जाता है। यहां देश-दुनिया के लोग रहते हैं, काम करते हैं और सपने देखते हैं। लेकिन महज कॉस्मोपोलिटिन होने का महज यही मतलब नहीं है कि शहर अपनी जड़ों से मुक्त हो जाए। हमें दुनिया के ऐसे अनेक बड़े शहरों की तरफ देखना चाहिए, जिनकी तुलना मुंबई से होती है। मसलन लंदन, पेरिस और टोकियो ये तमाम वैश्विक शहर अपने मूल भाषाई और सांस्कृतिक ढांचे को अक्षुण्ण रखे हुए हैं। मुंबई का मूल ढांचा मराठी भाषा, मराठी अस्मिता और इतिहास से निर्मित होता है। ऐसे में मेयर का पद महज प्रशासनिक पद नहीं है, बल्कि शहर का सांस्कृतिक गौरव और सांस्कृतिक ध्वज भी है। मेयर केवल नगर प्रशासन का मुखियाभर नहीं होता, वह शहर की प्रतिनिधि चेतना होता है और मुंबई में यह प्रतिनिधि चेतना मराठी है। इसलिए मुंबई से उसकी यह मातृचेतना नहीं छीनना चाहिए। अगर हम मुंबई के इतिहास को खंगालें तो वह मराठी श्रम का इतिहास है। यहां की कपड़ा मिलों से लेकर बंदरगाहों तक मराठी अस्मिता की सांस्कृतिक कड़ियां बिखरी पड़ी हैं।
औपनिवेशिक दौर में ये मराठी अस्मिता और विद्रोह की चेतना ही थी, जिसने उस दौर के शासकों की जड़ें हिलार्इं। ऐसे में यदि आज कोई उत्तर भारतीय चुनाव प्रक्रिया के जरिए मुंबई का मेयर बनता है, तो इसे संवैधानिक तरीके से कोई रोक नहीं सकता, लेकिन स्थानीय संस्कृति और अस्मिता को धक्का लगेगा और किसी भी लोकतंत्र में इतनी संवेदनशीलता तो होनी ही चाहिए, जो स्थानीयता में धड़क सके। इसलिए महज चुनाव जीतने और चुनाव जीतकर संख्याबल की बदौलत किसी विशेष सांस्कृतिक खंड पर बाहरी दुनिया के व्यक्ति को थोप देना, भले लोकतांत्रिक प्रक्रिया का उल्लंघन न हो, लेकिन लोकतांत्रिक संवेदना की निर्मम हत्या होगी। इसलिए मुंबई के सतरंगी स्वभाव में मराठी अग्रता को बरकरार रखा जाना चाहिए।
अस्तित्व!
क्या किसी उत्तर भारतीय शहर लखनऊ या बनारस में किसी मराठी को सहजता से मेयर स्वीकार किया जा सकता है और क्या सिर्फ इसलिए ऐसी तुलना नहीं की जानी चाहिए, क्योंकि बनारस और लखनऊ कॉस्मोपोलिटिन शहर नहीं हैं? किसी शहर के बारे में महज आंकड़ों के श्याम-श्वेत आईने से कोई निर्णय करना सही नहीं होता। क्योंकि लोकतंत्र महज संख्याबल नहीं, बल्कि लोक के साधना की जीवंत धड़कन है। हालांकि, यह तर्क गणितीय और संवैधानिक दृष्टि से सही होगा कि जिसका बहुमत होगा, उसी का शासक होगा। लेकिन फिर तो यह चुनावी आड़ में स्थानीयता की उपेक्षा होगी। शासन संवेदनशील और मर्यादित भी होना चाहिए। जब स्थानीय लोगों को लगेगा कि बाहरी लोग महज संख्या के कारण या भिन्न-भिन्न संख्याओं के रणनीतिक गठजोड़ के कारण स्थानीय अस्मिता और संवेदना को कुचल रहे हैं, तो यह न सिर्फ बहुसंख्यक की निरंकुशता को दर्शाएगा, बल्कि धीरे-धीरे देश के कई हिस्सों पर स्थानीय संस्कृति पर बाहरी वर्चस्व की होड़ शुरू करेगा। यह एक गलत शुरुआत होगी, जिस तरह पिछले कुछ दशकों में क्षेत्रीय आतंकवाद को इसी तरह के सरलीकरण हवा देते रहे हैं, अब वही प्रक्रिया माइक्रो-मैनेजमेंट के जरिए स्थानीय शासन और नेतृत्व पर भी हावी हो जाएगी, जो गलत होगी। ऐसे में बहुसंख्यक लोग स्थानीय संस्कृति के प्रति संवेदनशील नहीं रहेंगे और धीरे-धीरे स्थानीय भाषा और संस्कृति दोयम दर्जे की होकर अपना असर और अस्तित्व खो देंगी, जो लोकतंत्र की हत्या के समान होगा।
निर्विवाद योगदान
कोई नहीं जानता इससे बाहरी बनाम स्थानीय द्वेष किस हद तक बढ़ सकता है। क्योंकि हमें यह नहीं भूलना चाहिए, बाहरी चाहे जितनी बड़ी संख्या में आ जाएं, अगर स्थानीय लोगों को वो भावनात्मक और सांस्कृतिक रूप से नीचा दिखाने की कोशिश करेंगे, तो स्थानीय लोग विद्रोह करने पर उतारू हो जाएंगे और फिर २१वीं शताब्दी के मध्य की तरफ बढ़ते कालखंड में हम लोकतंत्र की खोल में नये ढंग के पनपते आतंकवाद को देखेंगे और सिर्फ देखेंगे ही नहीं, इसकी भारी कीमत भी चुकाएंगे। यह बिना कहे और बिना सोचे एक अलिखित शर्त के तौर पर होना चाहिए कि शासन चाहे जिस पार्टी का हो, हर पार्टी और हर स्थानीय मतदाता को स्थानीय लोगों की संवेदना और भावना का सम्मान करना चाहिए, वर्ना अगर इस तरह के सम्मान की कटौती होगी और महाराष्ट्र के बहुसंख्यक वर्गों को अगर लगेगा कि महज संख्या ज्यादा होने के कारण उन्हें बाहरी लोगों ने उनके ही डीएनए से बेदखल कर दिया है तो यह बात सहजता से किसी के दिल में नहीं पचेगी, बल्कि यह सच्चाई स्थानीयता को कुंठित करेगी और यह कुंठा लोकतंत्र को कमजोर करेगी। इसलिए संख्या में ज्यादा होने के बावजूद बाहरी लोगों को स्थानीय संस्कृति और भाषा के प्रति न केवल संवेदनशील होना चाहिए, बल्कि उसे उसका पहला हक हासिल करने में मददगार होना चाहिए।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि मुंबई को आधुनिक कारोबार का शहर बनाने में उत्तर भारतीयों का योगदान निर्विवाद है। वे शहर के आर्थिक धड़कनों का हिस्सा हैं, परंतु प्रतिनिधित्व में प्राथमिकता स्थानीय समाज को इसलिए भी मिलनी चाहिए, क्योंकि बाहरी लोग इन्हीं लोगों की लोकतांत्रिकता के तहत यहां फले-फूले हैं। ऐसे में अब उन्हें स्थानीयता की रक्षा करनी चाहिए। वैसे भी जब किसी क्षेत्र विशेष की अस्मिता का खंडित होने का मौका मिलता है तो वह बेहद रचनात्मक और इनक्लूसिव बनकर उभरती है, जिससे देश बल्कि दुनिया का लोकतंत्र मजबूत होता है और स्थानीयता का सम्मान बढ़ता है।
(लेखक विशिष्ट मीडिया एवं शोध संस्थान, इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर में वरिष्ठ संपादक हैं)
