सुनील ओसवाल
नई मुंबई के तुर्भे में स्थित सार्वजनिक बांधकाम विभाग (पीडब्ल्यूडी) की प्रयोगशाला कागजों में ‘क्वालिटी कंट्रोल’-असल में वह चाबी है, जिससे राज्य की सड़कें खुलती–बंद होती हैं। यहां कोई रोज नहीं दिखता, न ठेकेदार खुलेआम आता है, लेकिन यहीं से तय होता है कि सड़कें कब तक टिकेंगी और पुल कितनी जल्दी जवाब देंगे और पुल कितनी जल्दी मरम्मत के नाम पर फिर खोदे जाएंगे। सार्वजनिक बांधकाम विभाग की तुर्भे प्रयोगशाला-कागजों में ‘गुणवत्ता नियंत्रण’, जमीनी हकीकत में एक ऐसा केंद्र, जहां एक रिपोर्ट करोड़ों का रास्ता खोल देती है।
यहां सवाल टेस्ट होने–न होने का नहीं है। सवाल है-किसके सैंपल, किस हालत में, किस निगरानी में टेस्ट होते हैं। नियम साफ कहते हैं कि सैंपल सीधे साइट से, सीलबंद और विभागीय मौजूदगी में लिए जाएं। लेकिन हकीकत यह है कि कई मामलों में सैंपल वैâसे पहुंचे, कहां से आए-इसका कोई ठोस रिकॉर्ड नहीं। रजिस्टर में बस एक एंट्री होती है, जमीन पर जवाब नहीं।
लैब के भीतर खेल इससे भी आगे जाता है। क्रॉन्कीट पर पानी डालने का समय पूरा होने से पहले ही ‘स्ट्रेंथ पास’ वैâसे हो जाती है? मौसम के हिसाब से बदलने वाली बिटुमन क्वालिटी अचानक कागजों में बेहतर वैâसे दिखती है? जानकार बताते है रॉ डेटा कुछ और कहता है, फायनल रिपोर्ट कुछ और। बीच का अंतर फाइलों में नहीं दिखता, लेकिन सड़कों पर साफ नजर आता है।
सबसे संवेदनशील मुद्दा है री-टेस्ट। नियम में यह अपवाद है, व्यवहार में सुविधा। कुछ ठेकेदारों के सैंपल बार-बार री-टेस्ट तक जाते हैं, कुछ पहली बार में ही फेल कर दिए जाते हैं। यह फर्क तकनीकी कम, पहचान और पहुंच ज्यादा बताता है।
इसी प्रयोगशाला में उप अभियंता पद पर कार्यरत सैय्यद को लेकर भी सवाल उठते हैं। वे पहले शाखा अभियंता थे। पदोन्नति के बाद शहर बदला, लेकिन प्रयोगशाला नहीं। कारण क्या हैं, यह सिस्टम के भीतर चर्चा का विषय है। क्योंकि यह कुर्सी केवल तकनीकी नहीं-यह तय करती है कि कौन पास होगा, कौन रुकेगा।
सबसे गंभीर बात यह कि सैय्यद के कार्यकाल में तुर्भे लैब से जितनी टेस्ट रिपोर्टें जारी हुईं, उनके लिए कितनी रेत खरीदी गई, कितना डेब्रीस ‘अनुपयोगी’ घोषित हुआ, और टेस्टिंग में लैब का बिजली खर्च कितना आया-इन बुनियादी जानकारियों को सार्वजनिक नहीं किया गया। कॉन्टैक्टर के अनुसार, पास–फेल डेटा, री-टेस्ट की सूची, मशीन उपयोग का विवरण-सब बंद अलमारियों में है।
एनएबीएल ऑडिट, मशीन वैâलिब्रेशन और निरीक्षण कागजों में पूरे बताए जाते हैं। लेकिन जब सड़कें कुछ महीनों में उखड़ती हैं, तब कोई यह नहीं बताता कि किस रिपोर्ट के आधार पर बिल पास हुआ।
तुर्भे की प्रयोगशाला आज सिर्फ एक इमारत नहीं-पूरे विभाग का आईना है। अगर यहां के रजिस्टर खुले, रॉ रिपोर्ट सामने आईं और पैâसलों की परतें उतरीं, तो सिर्फ गड्ढों की नहीं, सिस्टम की तस्वीर भी साफ हो जाएगी। आखारी सवाल यही है- जब सड़कें बार-बार टूटती हैं, तो गलती जमीन पर है या रिपोर्ट में?
