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देश-परदेश : तेल का खेल

विजय कपूर

वेनेजुएला पर हमले का सारा खेल उसके तेल पर अमेरिकी कब्जे का है। नोबेल शांति पुरस्कार के स्वयंभू दावेदार अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेंस, जो सत्य साई बाबा के भक्त हैं, को ‘अगवा’ करके न्यूयॉर्क के डिटेंशन सेंटर (जिसे पृथ्वी पर नरक कहते हैं) में रखने के बाद कहा था कि अब इस दक्षिण अमेरिकी देश, जिसके पास संसार का सबसे अधिक तेल रिजर्व है, का प्रशासनिक संचालन यूएस करेगा।
दादागीरी
लेकिन अब संभवत: अंतर्राष्ट्रीय दबाव के तहत ट्रंप के सेक्रेटरी ऑफ स्टेट मार्को रुबियो जो एक संप्रभु देश पर बमबारी को इस तरह से खुश होकर बयान कर रहे थे, जैसे उन्होंने दिवाली पर पटाखे छोड़े हों, ने यू-टर्न लेते हुए कहा है कि अगर वेनेजुएला के शेष नेता ‘सही निर्णय लेते हैं’ तो यूएस उनके साथ मिलकर काम करने के लिए तैयार है। रुबियो के अनुसार, यूएस ‘फायदा उठाने के अनेक तरीके अपनाए रखेगा’, जिनमें से दो यह हैं कि वैâरिबियन में उसकी नौसेना की विशाल उपस्थिति रहेगी और तेल निर्यात एंबार्गो भी। …तो यह सारा खेल तेल पर कब्जा करने का है।
इसलिए यह मीम बन रहे हैं कि अगर किसी देश के पास एटम बम नहीं है, तो उसके तेल का मालिक यूएस है। दूसरी ओर वेनेजुएला की उप-राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिग्स, जो अब अंतरिम राष्ट्रपति हैं, ने निडर व विद्रोही स्वर अख्तियार करते हुए कहा है, ‘वेनेजुएला में केवल एक ही राष्ट्रपति है… निकोलस मादुरो।’ इसका अर्थ यह है कि लैटिन अमेरिका में ट्रंप का हस्तक्षेप जटिल, तनावपूर्ण और संसार के लिए चिंताजनक होने जा रहा है, विशेषकर इसलिए कि यूएस का अगला निशाना क्यूबा हो सकता है।
वेनेजुएला में जो कुछ हो रहा है, उसका भारत की तेल सप्लाई या दाम पर शायद तुरंत प्रभाव न हो, लेकिन अगर यूएस लैटिन अमेरिका के इस देश पर अपना प्रभुत्व थोप देता है, तो नई दिल्ली को अपने लिए तेल के विविध दरवाजे खोलने पड़ेंगे। यूएस के नेतृत्व में काराकास पर जो पाबंदियां लगी हुई हैं, उससे भारत सहित वैश्विक बाजारों में तेल पहले से ही कम पहुंच रहा है। पिछले साल वेनेजुएला भारत के लिए क्रूड पेट्रोलियम का १८वां सबसे बड़ा स्रोत बना था। बहरहाल, ४ जनवरी, २०२६ को नई दिल्ली ने अपनी खामोशी तोड़ते हुए वेनेजुएला के घटनाक्रम को गहरी चिंता का विषय बताते हुए सभी संबंधित देशों से आग्रह किया है कि वह बातचीत के जरिए शांतिपूर्वक इस मुद्दे को संबोधित करें और लैटिन अमेरिका में शांति व स्थिरता सुनिश्चित करें। लेकिन अन्य ब्रिक्स देशों जैसे रूस, चीन, ब्राजील व दक्षिण अप्रâीका की तरह भारत ने मादुरो के खिलाफ यूएस की ‘एकतरफा कार्रवाई’ की सीधे निंदा नहीं की है यानी नई दिल्ली ने चिंता व्यक्त की है, निंदा नहीं की है।
असमंजस
भारत की प्रतिक्रिया प्रेस रिलीज के रूप में आई, जिसमें यूएस का नाम नहीं लिया गया है। दरअसल, वेनेजुएला पर हमले व मादुरो को ‘अगवा’ किए जाने ने नई दिल्ली को राजनयिक असमंजस में फंसा दिया है कि एक ओर ट्रंप की एकतरफा हरकत है और दूसरी ओर भारत की घोषित नीति है, जो अंतर्राष्ट्रीय नियम-आधारित व्यवस्था की पक्षधर है। नई दिल्ली आमतौर से उन मुद्दों पर टिप्पणी करने से बचती है, जो भारतीय सीमाओं से बहुत दूर के होते हैं। लेकिन ग्लोबल साउथ भारत से अपेक्षा करता है कि वह अंतर्राष्ट्रीय कानून के पालन और किसी के अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप न करने पर बल दे। मादुरो जानते थे कोई अनहोनी होने जा रही है। कई महीनों से ट्रंप प्रशासन ने वेनेजुएला सरकार पर दबाव बनाया हुआ था, वैâरिबियन में विशाल सैन्य बल तैनात किया हुआ था और वेनेजुएला से आ रही नावों पर हमले किए जा रहे थे। वॉशिंगटन का ‘तर्क’ यह था कि वह वेनेजुएला से यूएस में ड्रग तस्करी को रोक रहा है, जो ट्रंप के अनुसार मादुरो की निगरानी में हो रही थी।
लेकिन यह तो दुनिया के दिखावे के लिए एक बहाना था, ट्रंप मादुरो को सत्ता से हटाना चाहते थे। वैसे मादुरो भी वेनेजुएला के कोई उदार नेता नहीं थे। वह भी अधिकतर दक्षिण अमेरिका के नेताओं की तरह कौडिल्लो ही थे यानी तानाशाह जो अपने राजनीतिक विरोधियों या जो कोई उनके खिलाफ खड़ा होने का साहस करता, को बेरहमी से कुचलते थे। उनका चुनाव भी दिखावा था- आम धारणा यही है कि २०२४ में हुआ पिछला चुनाव वह हार गए थे। इसलिए बहुत से वेनेजुएलाई उनकी ‘विदाई’ पर प्रसन्न हैं। लेकिन इससे यह तथ्य बदलता नहीं है कि ट्रंप द्वारा मादुरो व उनकी पत्नी का अपहरण (इस हरकत के लिए कोई अन्य शब्द है ही नहीं) वैश्विक नियमों का खुला उल्लंघन है, चाहे नियमों की किसी तरह भी व्याख्या की जाए और साथ ही निंदनीय व वीभत्स भी है। यह न तो अंतर्राष्ट्रीय नियमों के अनुरूप है और न ही ट्रंप की पूर्व घोषणा के अनुसार कि यूएस सेना विदेशों में हस्तक्षेप नहीं करेगी। इसके अतिरिक्त ट्रंप की हरकत अब वैसी ही प्रतीत हो रही है जैसी पुतिन यूक्रेन में कर रहे हैं या जिनपिंग ताइवान व वियतनाम में करने का इरादा रखते हैं।
फिर से उपनिवेशवाद
सवाल यह है कि ट्रंप चाहते क्या हैं? सबसे पहले तो यह जान लें कि ट्रंप की कोई दिलचस्पी नहीं है कि वेनेजुएला में लोकतंत्र आए। उन्होंने वेनेजुएला में विपक्षी नेता की संभावना को सिरे से खारिज कर दिया है और यह भी कि २०२५ की नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मारिया कोरिना मचाडो की काराकास में सत्ता परिवर्तन में कोई भूमिका होगी। मारिया ने आग्रह किया था कि एडमंडो गोंजालेज उर्रतिया को अंतरिम राष्ट्रपति बनाकर तुरंत सत्ता सौंप दी जाए, जिनके बारे में कहा जाता है कि २०२४ के चुनाव में उन्होंने मादुरो को पराजित कर दिया था। ट्रंप की दिलचस्पी मादुरो की उप-राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिग्स और वेनेजुएला के वर्तमान रईसों के साथ मिलकर इस देश की सरकार चलाने की है। दूसरा यह कि ट्रंप की नजर वेनेजुएला के तेल पर है और उन्होंने कहा भी है कि यूएस की तेल कंपनियां वेनेजुएला के ऊर्जा इंप्रâास्ट्रक्चर को दुरुस्त करेंगी व तीसरे देशों को तेल बेचना शुरू करेंगी। यह पुराने जमाने का खुला उपनिवेशवाद है।
वेनेजुएला के पास संसार का सबसे अधिक साबितशुदा तेल रिजर्व है। लेकिन उसका तेल हैवी होने के कारण आसानी से रिफाइन नहीं हो पाता है, शायद इसी वजह से उसका आउटपुट कुल का मात्र १ प्रतिशत है। अंतिम यह कि मोनरो डॉक्ट्रिन अब डॉनरो डॉक्ट्रिन के रूप में सामने आ रही है, जिसके तहत यूएस लैटिन अमेरिका के साथ ऐसे व्यवहार करता है जैसे वह उसके घर के पीछे का आंगन हो।
इसलिए रुबियो ने संकेत दिया है कि अगला निशाना क्यूबा हो सकता है, ‘मैं समझता हूं कि वह (क्यूबा) बहुत परेशानी में आनेवाला है।’ यह वास्तव में रूस व चीन के लिए संदेश है- यूक्रेन व ताइवान पर हमले जारी रखो, अन्य जगह स्ट्रेटेजिक एसेट्स खोते रहो। गौरतलब है कि मादुरो के अपहरण से जरा पहले चीन का एक प्रतिनिधि काराकास में था। बहरहाल, इस तथ्य को भी नहीं भूलना चाहिए कि अतीत में दक्षिण अमेरिका में यूएस के हस्तक्षेप के नतीजे घातक निकले हैं- पिनोशे के सैन्य शासन में चिली को याद कीजिए। कारोबारी ट्रंप को तो शायद इस बारे में कुछ भी मालूम न हो।

(लेखक सम-सामयिक विषयों के विश्लेषक हैं)

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