– चुनावी साल में प्रशासनिक विद्रोह
सुनील ओसवाल / मुंबई
राज्य में सस्ता अनाज हर जरूरतमंद तक समय पर पहुंचे, यह सिर्फ एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि करोड़ों गरीबों की रोजमर्रा की जिंदगी का सवाल है। लेकिन इसी सवाल पर अन्न व नागरी पुरवठा विभाग ने सरकार की साख दांव पर लगा दी है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के साफ और लिखित आदेशों को दरकिनार करते हुए धान्य ढुलाई से जुड़े अहम टेंडर जानबूझकर लटकाए गए, जिससे राज्य के कई हिस्सों में राशन वितरण ठप हो गया।
विश्वसनीय सूत्रों के मुताबिक, मुंबई, ठाणे, पालघर, रायगड, रत्नागिरी, अकोला, नागपुर, यवतमाल, जालना, सातारा, कोल्हापुर समेत कम-से-कम २० जिलों में धान्य परिवहन की निविदाएं समय पर नहीं निकाली गईं। नतीजा यह हुआ कि गोदामों में अनाज होने के बावजूद राशन दुकानों तक उसकी आपूर्ति रुक गई और कार्डधारकों को खाली हाथ लौटना पड़ा।
सुनियोजित मिलीभगत के आरोप
मुख्यमंत्री ने पहले ही स्पष्ट निर्देश दिए थे कि पुरानी टेंडर अवधि समाप्त होने से कम से कम छह महीने पहले नई निविदा प्रक्रिया पूरी की जाए और किसी भी स्तर पर देरी होने पर जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए। इसके बावजूद, विभागीय फाइलें महीनों तक दबाकर रखी गईं। नई प्रतिस्पर्धी निविदा लाने के बजाय पुराने ठेकेदारों को ही चुपचाप विस्तार दे दिया गया, ताकि उनकी पकड़ बनी रहे। यही वह बिंदु है, जहां प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि सुनियोजित मिलीभगत के आरोप खड़े हो रहे हैं।
सवालों के घेरे में पूरा विभाग
इस पूरे प्रकरण से सबसे बड़ा झटका गरीब और मध्यम वर्ग को लगा है। महंगाई पहले ही रसोई का बजट बिगाड़ चुकी है, ऊपर से सरकारी राशन की अनियमितता ने हालात और खराब कर दिए। कई इलाकों में दुकानदारों ने खुलेआम बताया कि उन्हें समय पर धान्य नहीं मिला, जबकि विभाग कागजों में आपूर्ति सामान्य दिखाता रहा। चुनावी माहौल में यह संकट सरकार के लिए सियासी सिरदर्द बनता जा रहा है। अन्न व नागरी पुरवठा विभाग, जो मंत्री छगन भुजबल के अधीन आता है, अब सीधे सवालों के घेरे में है।
