सूफी खान
मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के बीच तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयप एर्दोगान एक बार फिर एक्टिव हो गए हैं। इजरायल के खिलाफ अब तक का सबसे तीखा हमला बोला है। लेबनान पर पिछले दिनों हुए इजरायल के हमले से वो बेहद गुस्से में हैं और उन्होंने कहा है कि सीजफायर के दिन भी इजरायल ने २५४ निर्दोष लेबनानी नागरिकों का बेरहमी से कत्लेआम किया। तुर्की की राजधानी अंकारा में एक जनसभा को संबोधित करते हुए एर्दोगान ने इजरायली नेतृत्व और वहां की सैन्य कार्रवाई को कड़े शब्दों में फटकारा। उन्होंने इजरायल के सैन्य अभियान को एक ‘नरसंहार’ करार देते हुए कहा कि इजरायल का यह समूह खून का प्यासा और नफरत में अंधा हो चुका है। वे मासूम बच्चों, औरतों और आम नागरिकों का कत्लेआम कर रहे हैं। इनके लिए न तो कोई अंतर्राष्ट्रीय कानून मायने रखता है और न ही कोई इंसानी उसूल। यह समूह हर मानवीय कीमत को नजरअंदाज कर चुका है। एक्सपर्ट कहते हैं कि तुर्की जैसा सैन्य ताकत रखने वाला नाटो मुल्क अगर इस तरह की बातें कर रहा है तो कहीं न कहीं ये ईरान की जीत के संकेत हैं। दरअसल, इस जंग के बाद ईरान का प्रभाव खित्ते में बढ़ा है, ऐसे में एर्दोगान इजरायल के खिलाफ सख्त दिख रहे हैं। वो जानते हैं कि अगर ईरान ताकतवर हुआ तो आगे तुर्की से उसकी तुलना होगी और अगर ईरान हारा तो भी अमेरिका इजरायल का अगला निशाना तुर्की होगा, क्यों कि इजरायल इस पूरे क्षेत्र में किसी भी ताकतवर मुस्लिम देश को देखना नहीं चाहता। वो चाहता है कि या तो वो देश यूएई, कतर, जॉर्डन की तरह उसके प्रभाव में रहे या फिर उसे इतना कमजोर कर दिया जाए कि कुछ करने लायक ही न बचे। शायद एर्दोगान इस बात को भांप गए हैं और उन्होंने इजरायल के खिलाफ बोलते हुए विशेष रूप से उस आंकड़े का जिक्र किया जिसमें २५४ लोगों की मौत की बात कही गई है। तुर्की का दावा है कि इजरायल शांति समझौतों का इस्तेमाल केवल अपनी सैन्य बढ़त बनाने और नागरिकों को निशाना बनाने के लिए कर रहा है। अंकारा का मानना है कि लेबनान की संप्रभुता का उल्लंघन करके इजरायल पूरे क्षेत्र को एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध की ओर धकेल रहा है। इस पूरे विवाद में एक नया मोड़ तब आया जब यह चर्चा शुरू हुई कि अमेरिका और ईरान के बीच शांति बहाल करने के लिए पाकिस्तान एक मध्यस्थ की भूमिका निभा सकता है। अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति के गलियारों में यह चर्चा है कि अगर पाकिस्तान के जरिए होने वाली यह शांति वार्ता विफल होती है और युद्ध लंबा खिंचता है, तो तुर्की हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठेगा। एर्दोगान ने संकेत दिया है कि तुर्की अपनी सीमाओं और मुस्लिम अवाम की सुरक्षा के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। एक्सपर्ट कहते हैं कि प्रेसिडेंट रजब तैय्यब एर्दोगान खुद को मुस्लिमों के खलीफा के रूप में पेश करते रहे हैं। लेकिन ईरान के ताकतवर दिखने से उनका ये सपना टूटता दिख रहा है इसलिए ऐसे में वे फिर से अपनी जगह बनाने के लिए बयानबाजी शुरू कर चुके हैं, वर्ना गाजा पूरा तबाह हो गया और एर्दोगान तमाशा देखते रहे।
