मनमोहन सिंह
अंधेरी रात, चमकती बिजली और श्मशान की सन्नाटे भरी खामोशी। राजा विक्रम ने एक बार फिर पेड़ से उस लटकती हुई लाश को उतारा, अपने कंधे पर लादा और मौन होकर चल दिए। तभी लाश के भीतर बैठा बेताल अट्टहास कर उठा।
‘राजन! तेरी यह जिद और कूटनीति के ये पेचीदा गलियारे, दोनों ही समझने में बड़े कठिन हैं। चल, आज तुझे ईरान, इजरायल और अमेरिका के उस त्रिकोण की कहानी सुनाता हूं, जिसमें पाकिस्तान शांति का ‘पंच’ ढूंढने का ढोंग कर रहा है। पर याद रहे, अगर तूने जवाब जानते हुए भी अपना मुंह न खोला, तो तेरे सिर के टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे!’
पहला पेच है ट्रंप का अमेरिकी सिंहासन। अमेरिका की अर्थव्यवस्था हिचकोले खा रही है, लेकिन ट्रंप को सबसे बड़ी फिक्र अपनी ‘गद्दी’ की है। वे शांति का राग तो अलापते हैं, लेकिन असल में वे केवल यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि तेल की कीमतें न बढ़ें, ताकि उनका वोट बैंक सुरक्षित रहे। उनके लिए शांति कोई मानवीय मूल्य नहीं, बल्कि एक ‘इलेक्टोरल टूल’ चुनावी हथियार है।’
दूसरा पेच है नेतन्याहू और इजरायल का आंतरिक उबाल। इजरायल के भीतर जनता का रोष चरम पर है। नेतन्याहू भली-भांति जानते हैं कि जिस दिन युद्ध की आग ठंडी होगी, उसी दिन जनता उनसे पुराने हिसाब मांगेगी। उनके लिए युद्ध ‘सर्वाइवल किट’ है और शांति ‘पॉलिटिकल सुसाइड’। वे क्षेत्र को सुलगाए रखना चाहते हैं ताकि उनकी कुर्सी सलामत रहे।
‘तीसरा पेच है पाकिस्तान की बदहाली। पाकिस्तान की हालत उस बिन पेदे के लोटे जैसी है, जो न इधर का रहा न उधर का। वह मध्यस्थता की मेज पर तो बैठा, लेकिन उसकी अपनी झोली फटी हुई है। न अमेरिका उस पर भरोसा करता है, न ईरान उसे गंभीरता से लेता है। वह केवल अपनी गिरती साख और डूबती अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए ‘डाकिया’ बना फिर रहा है।’
और चौथा पेच है ईरान का ‘विन-विन’ जाल। ईरान इस वक्त खुद को प्रतिरोध की धुरी मानकर बैठा है। वह वार्ता की मेज पर केवल इसलिए है ताकि प्रतिबंधों की बेड़ियां ढीली हो सकें। लेकिन उसके भीतर सुलगता जन-विद्रोह उसे कभी भी पटखनी दे सकता है।’
बेताल ने हवा में कलाबाजी खाते हुए पूछा, ‘बता राजन! जब दुनिया के नेता शांति की मेज पर केवल अपनी ‘कुर्सी’ बचाने के लिए बैठते हैं, तो क्या वाकई वहां खून-खराबा रुक सकता है? इस वार्ता में सबसे बड़ा ‘पंच’ क्या है, इंसानियत की फिक्र या सत्ता का मोह? बोल राजन, बोल!’
राजा विक्रम का न्यायपूर्ण उत्तर
विक्रम रुके और गंभीर स्वर में बोले, ‘देख बेताल, इस अंतर्राष्ट्रीय सर्कस में कोई भी ‘शांति’ के लिए नहीं बैठा है। सब अपनी-अपनी चालें चल रहे हैं।
पहला है शांति बनाम युद्धविराम। यह वार्ता ‘हृदय परिवर्तन’ की कोशिश नहीं, बल्कि केवल एक ‘युद्धविराम’ का समय खरीदने की रणनीति है। कूटनीति अब समाधान निकालने के लिए नहीं, बल्कि समस्या को ‘मैनेज’ करने के लिए की जा रही है। दूसरा है कुर्सी का गणित तूने सही कहा कि ट्रंप के लिए शांति एक चुनावी मुद्दा है और नेतन्याहू के लिए युद्ध एक ढाल। जब शासकों को जनता के खून से ज्यादा अपनी गद्दी प्यारी हो, तो वार्ताएं केवल ‘फोटो-अप’ बनकर रह जाती हैं।’
तीसरी है अविश्वास की खाई! असली पेच कूटनीति में नहीं, बल्कि ‘अविश्वास की गहरी खाई’ में है। जब तक मुख्य खिलाड़ी एक-दूसरे के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करेंगे, तब तक शांति का हर प्रयास महज एक कागजी समझौता होगा।
सत्ता की बिसात और शांति का स्वांग
बेताल ने कहना शुरू किया, ‘राजन, खाड़ी में बारूद की गंध पैâली है और दुनिया तमाशा देख रही है। पाकिस्तान यहां ‘शांति दूत’ बनकर उभरना चाहता है, लेकिन इस कूटनीतिक खेल में चार ऐसे पेच’ फंसे हैं कि शांति की परिभाषा ही बदल गई है।’
