शाहिद ए चौधरी
जैसा अनुमान लगाया जा रहा था, वही हुआ। अमेरिका और ईरान के बीच कोई समझौता नहीं हुआ। पाकिस्तान के इस्लामाबाद में हुई वार्ता बिना किसी डील के समाप्त हो गई और अमेरिका के उप राष्ट्रपति यह कहते हुए वापस लौट गए कि उन्होंने ‘अंतिम व सर्वश्रेष्ठ प्रस्ताव’ रखा था। दूसरी ओर ईरान को पहले ही वार्ता की सफलता पर शक था, क्योंकि दो बार पहले जब वार्ताएं एकदम सही दिशा में जाते हुए समझौते के कगार पर पहुंचने वाली थीं तो अमेरिका ने धोखा दे दिया था।
जिनेवा में जब दूसरी वार्ता हुई तो उसमें शामिल ब्रिटेन के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जोनाथन पॉवेल को ‘आश्चर्य’ हुआ था कि तेहरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर वॉशिंगटन की हर बात मानने को तैयार हो गया था व वियना में तकनीकी वार्ता के लिए तिथि पर भी सहमति बन गई थी तो अमेरिका व इजरायल ने ईरान पर २८ फरवरी २०२६ की सुबह बेमतलब व बेमकसद का पुन: युद्ध थोप दिया था, मिनाब में १६८ स्कूलों की बच्चियों की हत्या करके। लेकिन तब से होर्मुज में बहुत पानी बह चुका है। अब भारी नुकसान व अपनी टॉप लीडरशिप को खोने के बावजूद तेहरान वॉशिंगटन की ‘अनुचित’ मांगों को ठुकराने की स्थिति में है और अमेरिका की स्वघोषित ताकत की सीमाएं भी जाहिर हो गर्इं हैं कि वह अपनी मनमानी व दादागीरी थोपने की स्थिति में नहीं रहा है, विशेषकर इसलिए कि इराक युद्ध की तरह अब विश्व एकध्रुवीय नहीं रहा है। रूस व चीन भी सुपरपॉवर के रूप में उभर चुके हैं और वह ईरान के समर्थन में खड़े हैं। ईरान ने कहा है कि वार्ता का छोड़ने का अमेरिका बहाना तलाश रहा था और अब गेंद अमेरिका के पाले में है।
इस बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि वॉशिंगटन ने युद्ध जीत लिया है, अब वार्ता का चाहे जो नतीजा निकले। ट्रंप ने यह भी दावा किया है कि उसके दो जहाज स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरे हैं, समुद्री माइंस को ‘क्लियर’ करते हुए, जबकि ईरान ने इस दावे का खंडन करते हुए चेतावनी दी है कि कोई भी सैन्य जहाज होर्मुज को अगर पार करने का प्रयास करेगा तो उसे ‘भयावह प्रतिक्रिया’ का सामना करना पड़ेगा। उधर दक्षिण लेबनान में इजरायल की एयर स्ट्राइक्स जारी हैं और हिजबुल्लाह भी जवाबी कार्रवाई कर रहा है। हालांकि, अमेरिका व ईरान में उच्चस्तरीय व आमने-सामने की वार्ता लगभग ४७ साल बाद हुई, लेकिन विवाद व अविश्वास के वातावरण में हुई इस २१ घंटे की गहन वार्ता का कोई नतीजा निकलना ही नहीं था; क्योंकि युद्ध से पहले और युद्ध के बाद गोलपोस्ट ही बदल गए और इजरायल (बल्कि बेंजामिन नेतन्याहू कहना अधिक दुरुस्त होगा) जो न पहले शांति चाहता था और न अब चाहता है किसी भी डील में सबसे बड़ा रोड़ा है। जिनेवा में वार्ता का फोकस मुख्यत: ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर था, लेकिन इस्लामाबाद में अमेरिका की तरफ से जो १५ पॉइंट्स रखे गए व ईरान की तरफ से जो १० पॉइंट्स रखे गए, उनमें अन्य विवाद भी शामिल हुए, जो परमाणु कार्यक्रम और पहली बार शामिल हुए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज व सभी मोर्चों पर विस्तृत युद्धबंदी तक सीमित नहीं हैं। असहमति का असल बिंदु यह था कि अमेरिका इस बात का वायदा करने के लिए तैयार नहीं था कि वह लेबनान के खिलाफ इजरायल आक्रमण पर विराम लगाएगा।
जाएगी कुर्सी!
अमेरिका ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की सुरक्षा पर जो शर्त रखी वह ईरान को स्वीकार नहीं थी। यही विवाद के बिंदु आखिरकार मुख्य अड़चन बन गए। वार्ता इस पृष्ठभूमि में टूटी कि इजराइल ने बैरुत पर अंधाधुंध गोलाबारी की, जिसमें सैंकड़ों निर्दोष लोग मारे गई और जिसकी व्यापक अंतर्राष्ट्रीय निंदा हुए है व इसे युद्धविराम के उल्लंघन के रूप में देखा जा रहा है। दरअसल, डील के संदर्भ में मुख्य चुनौती इजरायल की तरफ से आनी थी और उसी की तरफ से आई भी। दो सप्ताह के युद्धविराम पर नेतन्याहू की गुस्साभरी प्रतिक्रिया सामने आई थी। उन्होंने युद्ध के मुख्य उद्देश्य ईरान में ‘सत्ता परिवर्तन’ बताया था, जो कि नहीं हुआ। चूंकि अमेरिका ने पुराने शासकों से ही वार्ता आरंभ कर दी तो यह स्पष्ट हो गया कि इजरायल का घोषित रणनीतिक उद्देश्य हासिल नहीं हुआ इसलिए युद्धविराम के घोषित होते ही इजरायल ने बैरुत के नागरिकों पर बमबारी करनी शुरू कर दी, ताकि ईरान को उकसाया जा सके और युद्धविराम विफल हो जाए। लेकिन ईरान ने युद्धविराम को जारी रखा, इस घोषणा के साथ कि लेबनान में अपने साथियों को वह अकेला नहीं छोड़ेगा। इटली, स्पेन व ऑस्ट्रेलिया ने इजरायल द्वारा की गई बमबारी की निंदा की और युद्धविराम का सम्मान करने के लिए कहा। गल्फ को-ऑपरेशन काउंसिल (जीसीसी) भी युद्धविराम के पक्ष में है और चाहती है समस्या का शांतिपूर्ण हल निकालने के प्रयास जारी रहने चाहिए। बावजूद इसके कि ईरान व यूएई में विश्वास का अभाव जारी है।
यहां दो अन्य बातों को समझना भी आवश्यक है। एक, इजरायल के सांसद नामा लजिमी का आरोप है कि नेतन्याहू ने जानबूझकर ७ अक्टूबर का हमास हमला होने दिया था, ताकि वह युद्ध में जा सकें और अदालत में पेश होने से बच सकें, जहां उनके व उनकी पत्नी के खिलाफ भ्रष्टाचार व अन्य मामलों के अनेक मुकदमे चल रहे हैं। इसी के चलते नेतन्याहू ने अतीत में अनेक समझौता-वार्ताओं को नुकसान पहुंचाया है। मसलन, ९ सितंबर २०२५ को उन्होंने दोहा में हमास की वार्ता टीम पर हमला कराया, जिसमें पांच लोग मारे गये थे। इससे पहले नेतन्याहू ने न्यायपालिका को नियंत्रित करने के लिए एक विधेयक लाने का प्रयास किया था, जिसका इजरायल में जबरदस्त जनविरोध हुआ था और विधेयक को वापस लेना पड़ा। फिर नेतन्याहू ने ट्रंप के माध्यम से इजरायल के राष्ट्रपति इसहाक हेरजोग पर भ्रष्टाचार के मुकदमे वापस लेने का दबाव बनाया, जो सफल नहीं हुआ। युद्ध के समाप्त होते ही न सिर्फ नेतन्याहू की कुर्सी जाएगी, बल्कि अपनी पत्नी के साथ वह जेल में होंगे। सांसद लजिमो का आरोप है कि खुद को बचाए रखने के लिए नेतन्याहू इजरायल को लगातार युद्ध में झोंके हुए हैं।
ईरान को सपोर्ट!
दूसरा यह कि अमेरिका व ईरान के बीच जो तीन असफल वार्ताएं अब तक हुई हैं, उन सभी में ट्रंप के यहूदी दामाद जरेड कुशनर व ट्रंप के करीबी दोस्त रियल एस्टेट निवेशक स्टीव विटकोफ शामिल रहे हैं। यह दोनों ही नेतन्याहू के करीबी हैं और अमेरिकी विशेषज्ञों के अनुसार नेतन्याहू के लिए ही काम करते हैं, जबकि ये न तो अमेरिकी प्रशासन में कुछ हैं और न ही इन्हें कूटनीति का कोई अनुभव है। इस स्थिति में इस्लामाबाद में वार्ता का विफल होना तो तय ही था।
हालांकि, अब वैश्विक दबाव वार्ता को जारी रखने का बन रहा है; क्योंकि हर किसी की अर्थव्यवस्था प्रभावित हो रही है, अमेरिका में भी युद्ध का जनविरोध व ट्रंप को हटाने के लिए अनुच्छेद २५ लागू करने की मुहिम तेज है। सऊदी अरब के रक्षा मंत्रालय ने घोषणा की है कि संयुक्त रणनीतिक रक्षा समझौते के तहत उसके पूर्वी सेक्टर में स्थित किंग अब्दुल अजीज एयर बेस की सुरक्षा करने के लिए पाकिस्तान का सैन्य बल वहां पहुंच गया है, जिससे लगता है कि सऊदी अरब अमेरिका पर अपनी रक्षा निर्भरता कम करते हुए ईरान से संबंध बेहतर करने का इच्छुक है और चीन ने ईरान को एयर डिफेंस सिस्टम दिया है। इस पृष्ठभूमि में ट्रंप कह रहे हैं कि वह वेनेज़ुएला की तरह ईरान का नेवल ब्लॉकेड करेंगे और अपनी शर्तें मनवाएंगे। ट्रंप क्या कहते हैं और क्या करते हैं, यह उन्हें स्वयं मालूम नहीं है इसलिए फिलहाल के लिए सब कुछ अनिश्चित है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
