मुख्यपृष्ठस्तंभपड़ताल :  मुंबई पर मंडरा रहा डेंगू-मलेरिया का खतरा

पड़ताल :  मुंबई पर मंडरा रहा डेंगू-मलेरिया का खतरा

-बरसात से पहले ही डराने लगे आंकड़े

-कागजी दावों में उलझा प्रशासन,

-जमीन पर हालात चिंताजनक

जेदवी

देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में मच्छर जनित बीमारियों का खतरा एक बार फिर तेजी से बढ़ता दिखाई दे रहा है। मानसून अभी शुरू भी नहीं हुआ है, लेकिन डेंगू और मलेरिया के शुरुआती आंकड़े ही चिंता पैदा करने के लिए काफी हैं। हर साल की तरह इस बार भी प्रशासन की ओर से कई अभियान चलाने और सख्त निगरानी के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन पिछले वर्षों के आंकड़े और मौजूदा हालात इन दावों पर गंभीर सवाल खड़े करते नजर आते हैं। विशेषज्ञों का साफ कहना है कि अगर अभी से ठोस और सख्त कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले मानसून में मुंबई को मच्छर जनित बीमारियों के बड़े प्रकोप का सामना करना पड़ सकता है।
साल की शुरुआत में ही बढ़े मामले
मुंबई मनपा और स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष २०२६ की शुरुआत से ही डेंगू और मलेरिया के मामलों में वृद्धि दर्ज की गई है। सामान्यत: इन बीमारियों के मामले मानसून के दौरान ज्यादा देखने को मिलते हैं, लेकिन इस बार बरसात से पहले ही मरीज सामने आने लगे हैं।
जनवरी – ७ मार्च २०२६ (मनपा के आंकड़े)
मलेरिया- ९१८, इनमें २२२ मामले प्लास्मोडियम फाल्सीपेरम के।
डेंगू- १८२, मामलों में लगातार बढ़ोतरी।
चिकनगुनिया- ९, सीमित लेकिन खतरा मौजूद।
हालांकि, राहत की बात यह है कि इस अवधि के दौरान इन बीमारियों से किसी भी मरीज की मौत दर्ज नहीं हुई है। लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल शुरुआती संकेत हैं और असली चुनौती मानसून के दौरान सामने आती है।
पांच साल के आंकड़े खोल रहे सच्चाई
पिछले कुछ वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो साफ दिखाई देता है कि मच्छर जनित बीमारियां मुंबई में लगातार गंभीर समस्या बनती जा रही हैं। महामारी के दौरान मामलों में कुछ कमी जरूर आई थी, लेकिन जैसे ही शहर सामान्य स्थिति में लौटा, डेंगू और मलेरिया के मामलों ने फिर से तेजी पकड़ ली।
२०२५ में आया बड़ा उछाल
पिछले साल स्थिति सबसे ज्यादा चिंताजनक रही। केवल अगस्त २०२५ के महीने में ही मलेरिया और डेंगू के मामलों में भारी उछाल दर्ज किया गया था।
मलेरिया: १,५५३ मामले
डेंगू: १,१५९ मामले
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, यह स्थिति इस बात का संकेत थी कि शहर में मच्छरों पर नियंत्रण की व्यवस्था पर्याप्त प्रभावी नहीं है।
‘जीरो मॉस्किटो ब्रीडिंग’ अभियान पर सवाल
बढ़ते खतरे को देखते हुए मनपा ने ‘जीरो मॉस्किटो ब्रीडिंग अभियान’ चलाने का दावा किया है। इसके तहत घर-घर सर्वेक्षण, बुखार की जांच, संदिग्ध क्षेत्रों से रक्त नमूने लेना और पानी जमा होने वाले स्थानों की जांच जैसे कदम उठाए जा रहे हैं, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि हर साल यही अभियान चलाने के बावजूद आखिर मामलों में कमी क्यों नहीं आ रही? क्या ये अभियान केवल कागजों तक सीमित रह जाते हैं या जमीनी स्तर पर इनकी प्रभावी निगरानी नहीं हो पाती?
निर्माण स्थल बन रहे बीमारी के केंद्र
मुंबई में बड़ी संख्या में मलेरिया और डेंगू के मामले निर्माण स्थलों से जुड़े पाए जाते हैं। शहर में चल रहे हजारों निर्माण कार्यों के कारण कई जगहों पर लंबे समय तक पानी जमा रहता है, जो मच्छरों के पनपने के लिए अनुकूल वातावरण बनाता है।इसके अलावा मजदूरों के रहने की खराब व्यवस्था, आस-पास गंदगी और सफाई व्यवस्था की कमी भी बीमारी के पैâलने का बड़ा कारण है। घनी आबादी वाले इलाके और निर्माणाधीन परियोजनाएं आज मच्छरों के सबसे बड़े प्रजनन केंद्र बनते जा रहे हैं।

 

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