सुनील ओसवाल
सरकारी तंत्र में एक शब्द बड़ा मासूम लगता है-‘आकस्मिक’। मतलब, अचानक आई स्थिति… तुरंत खर्च… बिना देरी के काम। लेकिन जब यही ‘आकस्मिक’ बार-बार फाइलों में दिखने लगे और हर बार उसके पीछे अलग कहानी छुपी मिले, तब शक होना लाजमी है।
उरण के रेल ओवर ब्रिज प्रोजेक्ट की फाइलें कुछ ऐसा ही संकेत देती हैं। पहली नजर में सब कुछ सामान्य-छोटे-छोटे खर्च, अलग-अलग मंजूरियां और हर जगह वही लाइन-‘नियमों के अधीन।’ लेकिन जैसे-जैसे कागज पलटे, तस्वीर बदलती गई। पुल के नाम पर पैसा निकला, मगर जमीन पर पुल नहीं… खरीदारी दिखने लगी। कंप्यूटर, प्रिंटर, लैपटॉप, ये सब क्या किसी आपातकाल का हिस्सा थे? भूमिगत मार्ग के फंड से उपकरण खरीदे गए, सड़क मरम्मत के पैसों से टोल गणना की व्यवस्था की गई। और सबसे चौंकाने वाला मानखुर्द का कल्वर्ट, जो बना ही नहीं, और पैसा भी खर्च हो गया। यहीं से ‘आकस्मिक’ शब्द का असली मतलब बदलता नजर आता है।
फाइलों में एक और दिलचस्प पैटर्न दिखता है- रकम कभी बड़ी नहीं दिखती। ४ लाख, १७ लाख, ४८ लाख… सब कुछ छोटे हिस्सों में। लेकिन जब इन्हें जोड़ा जाए तो आंकड़ा करोड़ों तक पहुंचता है। सवाल उठता है- क्या यह महज संयोग है या फिर सोच-समझकर अपनाई गई रणनीति?
इस पूरी प्रक्रिया में जिन दस्तावेजों पर नजर जाती है, उनमें कुछ नाम बार-बार सामने आते हैं-अधीक्षक अभियंता संध्या सापटणेकर, तत्कालीन कार्यकारी अभियंता गुप्ता और उप अभियंता ओमप्रकाश पवार। फाइलों पर उनके हस्ताक्षर मौजूद हैं, मंजूरियां दर्ज हैं और यही वह बिंदु है, जहां सवाल सीधे जिम्मेदारी की ओर इशारा करते हैं। सबसे बड़ा विरोधाभास तो वहीं दिखता है, जहां एक ही दस्तावेज में नियमों की बात भी है और उन्हीं नियमों को मोड़ने की मंजूरी भी। यह सिर्फ लापरवाही नहीं लगती, बल्कि एक ऐसी प्रणाली का हिस्सा दिखता है, जहां ‘प्रक्रिया’ सिर्फ कागजों तक सीमित रह गई है। स्थानीय स्तर पर बातचीत में एक बात बार-बार सुनाई देती है-‘सब कुछ सिस्टम से हुआ है।’ लेकिन सवाल यह है कि अगर सिस्टम ही ऐसा हो जाए तो जवाबदेही किससे मांगी जाए?
जिला नियोजन निधि तक के इस्तेमाल पर भी अब उंगलियां उठ रही हैं। अगर एक छोटे पुल के लिए आया पैसा दूसरी खरीद में जा रहा है, तो फिर विकास योजनाओं का क्या मतलब बचता है?
इस कहानी का सबसे खामोश पहलू है-चुप्पी। न कोई स्पष्ट जवाब, न कोई खुला स्पष्टीकरण। फाइलें बोल रही हैं, आंकड़े इशारा कर रहे हैं, लेकिन जिम्मेदार चेहरे खामोश हैं। ‘आकस्मिक’ अब एक जरूरत नहीं, एक रास्ता बनता दिख रहा है। ऐसा रास्ता, जहां नियम कागजों में रहते हैं और पैâसले कहीं और होते हैं और शायद यही वजह है कि यह मामला सिर्फ एक प्रोजेक्ट तक सीमित नहीं रहेगा… यह सवाल अब पूरे सिस्टम पर है।
