राजेश सरकार / प्रयागराज
भारत रत्न डॉ. भीमराव आंबेडकर की जयंती पर शहर में श्रद्धांजलि का स्वर तो गूंजा, लेकिन उसके साथ ही राजनीतिक दलों के बीच वर्चस्व की होड़ भी खुलकर सामने आई। कई स्थानों पर हालात ऐसे बने कि बाबा साहेब की प्रतिमा तक भीड़ में ओझल हो गई और केंद्र में उनकी विचारधारा नहीं, बल्कि ‘फोटो पॉलिटिक्स’ नजर आई।
इलाहाबाद हाई कोर्ट चौराहे पर समाजवादी पार्टी कार्यकर्ताओं में प्रतिमा के सामने फोटो खिंचाने को लेकर धक्कामुक्की हो गई। अफरातफरी के बीच प्रतिमा ही भीड़ के पीछे छिपती नजर आई, जिससे श्रद्धांजलि का मूल उद्देश्य सवालों के घेरे में आ गया। दूसरी ओर भाजपा नेताओं ने भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराने में कोई कसर नहीं छोड़ी। शहर पश्चिमी के विधायक सिद्धार्थ नाथ सिंह समर्थकों के साथ पहुंचे और प्रतिमा को पानी से धोकर माल्यार्पण किया। उनके साथ फूलपुर सांसद प्रवीण पटेल, महानगर अध्यक्ष संजय गुप्ता सहित बड़ी संख्या में कार्यकर्ता मौजूद रहे। नारेबाजी के बीच बाबा साहेब को श्रद्धासुमन अर्पित किए गए। सुबह से ही अलग-अलग दलों के कार्यक्रमों की रफ्तार तेज रही। अधिवक्ताओं ने भी 10 बजे प्रतिमा पर माल्यार्पण कर श्रद्धांजलि दी। इससे पहले रात में ही सभी दलों ने अपनी-अपनी तैयारियां पूरी कर ली थीं, जिससे जयंती आयोजन एक तरह की ‘राजनीतिक प्रतिस्पर्धा’ में बदलता दिखा। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के निर्देश पर जिले में करीब 500 स्थानों पर कार्यक्रम आयोजित किए गए। सपा नेताओं ने संगोष्ठी, गोष्ठी और जनजागरूकता अभियानों के जरिए सामाजिक न्याय और समानता का संदेश देने की बात कही। प्रवक्ता दान बहादुर मधुर ने बाबा साहेब के संविधान को देश की लोकतांत्रिक नींव बताया। वहीं भाजपा ने भी जयंती को व्यापक स्तर पर मनाने का दावा किया। सांसद प्रवीण पटेल के अनुसार पार्टी ने 15 दिवसीय कार्यक्रमों की रूपरेखा तैयार की है। पूर्व मेयर अभिलाषा गुप्ता नंदी समेत कई नेता प्रतिमा स्थल पर पहुंचकर श्रद्धांजलि देते नजर आए। इसके बावजूद दिनभर चले इन आयोजनों ने एक अहम सवाल खड़ा कर दिया-क्या बाबा साहेब के विचार और उनके बताए सामाजिक न्याय के मूल सिद्धांत वाकई केंद्र में हैं, या फिर उनका नाम महज सियासी ताकत दिखाने का माध्यम बनता जा रहा है?
