मुख्यपृष्ठस्तंभइस्लाम की बात :  इतिहास की आड़ में नफरत का विस्तार

इस्लाम की बात :  इतिहास की आड़ में नफरत का विस्तार

सैयद सलमान, मुंबई

जब सत्ता के शीर्ष पर बैठे गिरिराज सिंह जैसे लोग यह कहते हैं कि ‘विभाजन के समय सभी मुसलमानों को पाकिस्तान भेज दिया गया होता तो भारत आज स्वर्ग होता’, तब भारतीय मुसलमानों के सीने पर जख्म और गहरे हो जाते हैं। ऐसे लोग महज एक सियासी जुमला नहीं उछालते, दरअसल वे उस साझी विरासत के सीने पर गहरा घाव करते हैं, जिसे सदियों के सह-अस्तित्व ने बड़ी शिद्दत से सींचा है। इस तरह के बोल भारत की उस रूह को छलनी कर देते हैं, जो विविधता को ही अपनी सबसे बड़ी ताकत मानती है। यह उस मुस्लिम समाज के आत्म-सम्मान और उनकी निष्ठा का अपमान है, जिसने १९४७ के भयानक दौर में जिन्ना के दो-राष्ट्र सिद्धांत को ठोकर मार दी थी और इस मिट्टी को अपना आखिरी आशियाना चुना था।
सामूहिक संकल्प
इतिहास के पन्ने गवाह हैं कि १९४७ का वह भयानक मंजर कोई आसान सा बंटवारा नहीं था। वह एक ऐसा मानवीय और भौगोलिक ऑपरेशन था, जिसमें स्मृतियों, रिश्तों और वफादारियों की अनगिनत घायल परतें शामिल थीं। ब्रिटिश हुकूमत ने रियासतों को यह विकल्प दिया था कि वे अपनी मर्जी से भविष्य का रास्ता चुनें। उस नाज़ुक वक्त में भारत का जो स्वरूप उभरा, वह किसी एक मजहब की जीत नहीं थी। वह तो उन तमाम लोगों के अटूट विश्वास का नतीजा था, जिन्होंने एक धर्मनिरपेक्ष और आधुनिक राष्ट्र के सपने में अपना भविष्य देखा था।
कल्पना कीजिए, अगर उस दौर का नेतृत्व गिरिराज जैसी संकीर्णता की भाषा बोलता तो आज भारत का भूगोल वैâसा होता। क्या मुस्लिम बहुल कश्मीर की वादियां और लक्षद्वीप के तट या ईसाई बहुल पूर्वोत्तर के सुरम्य पहाड़ आज तिरंगे की शान बढ़ा रहे होते? क्या पंजाब के सिखों, लद्दाख के बौद्धों और दक्षिणी प्रदेशों को इस सरजमीं पर वह अपनापन महसूस होता, जो एक साझा पहचान के भीतर मिलता है? सनद रहे कि भारत की अखंडता किसी एक वर्ग की निशानी नहीं है, बल्कि यह हर उस भारतीय नागरिक का सामूहिक संकल्प है, जिसने इस देश की मिट्टी को चंदन माना है।
खामोश सहमति
जहां तक बात मुस्लिम समाज की है तो उनका दर्द उस वक्त और भी गहरा हो जाता है, जब उनकी देशभक्ति को बार-बार कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है। आजाद भारत की पहली सुबह लाल किले की प्राचीर से जो सुर गूंजे, वह उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की शहनाई की पवित्र तान थी। उस धुन में किसी मजहब की लय नहीं, बल्कि एक नए राष्ट्र का उल्लास था। १९४७-४८ के युद्ध में जब ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान ने नौशेरा की हिफाजत करते हुए जान दे दी तो उनका लहू इसी मिट्टी की खुशबू में घुल गया। नौशेरा शहीद ब्रिगेडियर उस्मान की वजह से भारत का अभिन्न अंग बन सका। भोपाल, हैदराबाद और जूनागढ़ जैसी रियासतों का भारत में शामिल होना महज प्रशासनिक पैâसला नहीं था, यह उन लाखों मुसलमानों का यकीन था, जिन्होंने इस देश के संविधान पर भरोसा जताया था।
आज जब समाज में जहरीली बयानबाजी का दौर बढ़ रहा है, तब सत्ता की खामोश सहमति उसे और भी खौफनाक बना देती है। जब प्रधानमंत्री तक ऐसे नफरती बयानों पर चुप्पी साध लेते हैं, तब हाशिए पर खड़ा मुस्लिम समाज खुद को और भी ठगा हुआ और असुरक्षित महसूस करता है। यह खामोशी उन ताकतों को खाद-पानी देती है जो संविधान की मूल भावना को ही बदल देना चाहते हैं। लोकतंत्र में बहस और असहमति की जगह हमेशा होनी चाहिए, लेकिन तिरस्कार और बहिष्कार की भाषा किसी भी सभ्य समाज के लिए आत्मघाती है।
प्रतिशोध की राजनीति
इस कठिन समय में मुस्लिम समाज के भीतर एक अजीब-सी बेचैनी है। अपनी वफादारी का बार-बार प्रमाण देना और इतिहास के उन पन्नों को कुरेदना जिनसे राष्ट्र बना है, अब एक थका देनेवाली प्रक्रिया बन चुकी है। फिर भी, इस दौर में संयम ही सबसे बड़ी ढाल है। उग्रता नफरत की उस आग को भड़काती है, जिसे कुछ लोग राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए जिंदा रखना चाहते हैं। आज जरूरत इस बात की है कि इस नफरत का मुकाबला संवैधानिक मूल्यों, शांति और तर्कों की मजबूती से किया जाए।
भारत की असल खूबसूरती उसके इंद्रधनुषीय रंगों में छिपी है। जो लोग इतिहास को तोड़-मरोड़ कर प्रतिशोध की राजनीति करना चाहते हैं, वे इस मुल्क की बुनियादी रूह से वाकिफ नहीं हैं। यह राष्ट्र जितना किसी बहुसंख्यक का है, उतना ही उस अल्पसंख्यक का भी है जिसने विभाजन की विभीषिका के बीच भी इस सरजमीं को अपनी जन्नत माना था। ऐसे बयानों की मजम्मत करना सिर्फ एक तबके का काम नहीं है, बल्कि यह उस हर नागरिक का फर्ज है जो भारत को एक महान और मानवीय देश के रूप में देखना चाहता है। याद रहे, खामोशी कई बार नफरत के हक में दी गई सबसे बड़ी गवाही बन जाती है।
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक हैं। देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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