मुख्यपृष्ठस्तंभन्याय पर सवाल : निष्पक्षता की कसौटी पर अदालतें

न्याय पर सवाल : निष्पक्षता की कसौटी पर अदालतें

साहब सिंह

न्यायपालिका किसी भी लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण संस्थाओं में से एक मानी जाती है। इसकी विश्वसनीयता इस बात पर टिकी होती है कि आम नागरिक को यह भरोसा हो कि अदालतें निष्पक्ष हैं और बिना किसी पूर्वाग्रह के न्याय करती हैं। लेकिन जब खुद न्यायाधीशों के आचरण को लेकर सवाल उठने लगें, तो यह केवल व्यक्तिगत मामलों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी न्यायिक व्यवस्था की साख को प्रभावित करता है।
कई बार यह देखा गया है कि कुछ न्यायाधीश किसी मामले की सुनवाई से स्वयं को अलग कर लेते हैं। इसका कारण उनकी अक्षमता नहीं, बल्कि नैतिक जिम्मेदारी होती है। यदि उन्हें लगता है कि मामले से उनका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संबंध है, या उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठ सकता है, तो वे पीछे हटना ही बेहतर समझते हैं। यह परंपरा न्यायपालिका में पारदर्शिता और विश्वास बनाए रखने के लिए आवश्यक भी है।
हालांकि, समस्या तब खड़ी होती है जब यही मानक सभी मामलों में समान रूप से लागू नहीं होते। कुछ न्यायाधीश ऐसे भी रहे हैं जिन्होंने अपने ऊपर लगे आरोपों या विवादों के बावजूद मामलों की सुनवाई जारी रखी। यह स्थिति स्वाभाविक रूप से संदेह पैदा करती है। जब किसी पक्ष द्वारा न्यायाधीश की निष्पक्षता पर सवाल उठाया जाता है, तो यह केवल एक पक्ष की रणनीति नहीं होती, बल्कि न्याय के मूल सिद्धांतों से जुड़ा मुद्दा बन जाता है।
हालिया मामलों में भी यह सवाल उभरा है कि क्या न्यायिक नैतिकता का पालन समान रूप से हो रहा है। यदि किसी केस में एक पक्ष को यह आशंका है कि न्यायाधीश निष्पक्ष नहीं रह पाएंगे, तो उस स्थिति में न्यायाधीश का स्वयं को अलग कर लेना ही न्याय के हित में माना जाता है। ऐसा न करने पर निर्णय चाहे जो भी हो, उसकी वैधता पर संदेह बना रहता है।
भीमा कोरेगांव जैसे मामलों में कई न्यायाधीशों का खुद को अलग कर लेना यह दिखाता है कि न्यायपालिका के भीतर इस नैतिकता की समझ मौजूद है। लेकिन दूसरी ओर, कुछ मामलों में ऐसा न होना असंगति को उजागर करता है। यही असंगति न्यायपालिका की छवि को कमजोर करती है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि न्याय केवल किया जाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह दिखना भी चाहिए कि न्याय किया गया है। यदि आम जनता के मन में यह संदेह पैदा हो जाए कि फैसले प्रभावित हो सकते हैं, तो न्यायिक व्यवस्था का आधार ही कमजोर पड़ जाता है। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि न्यायाधीशों के लिए एक स्पष्ट और सुसंगत आचार संहिता हो, जिसका पालन हर स्थिति में समान रूप से किया जाए। व्यक्तिगत विवेक पर निर्भर निर्णय कई बार विवादों को जन्म देते हैं। न्यायपालिका की गरिमा बनाए रखने के लिए यह जरूरी है कि निष्पक्षता केवल सिद्धांत न रहकर व्यवहार में भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे। न्यायपालिका की सबसे बड़ी ताकत जनता का विश्वास है। यदि यह विश्वास कमजोर होता है, तो उसके परिणाम दूरगामी और गंभीर हो सकते हैं। ऐसे में हर छोटे-बड़े निर्णय में पारदर्शिता और नैतिकता को प्राथमिकता देना ही न्यायिक व्यवस्था की स्थिरता और सम्मान को बनाए रख सकता है।

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