मुख्यपृष्ठसमाचारडॉ. सीमा की नवीनतम पुस्तक चित्रा मुदगल के स्त्री विमर्श पर

डॉ. सीमा की नवीनतम पुस्तक चित्रा मुदगल के स्त्री विमर्श पर

-डाॅ. रवीन्द्र कुमार

हमारे दौर में चित्रा मुद्गल एक ऐसा नाम है, जिन्होंने अपना पूरा जीवन साहित्य की सेवा में लगा दिया। चित्रा मुद्गल जी का लेखन महिलाओं की स्थिति पर है। उनकी समस्याओं, उनके सरोकार उनकी दैनिक ज़रूरत उनके दैनिक दर्द और उनकी सोच को एक ज़ुबान देता हैं। डॉ सीमा ने अपनी इस पुस्तक में चित्रा जी के तीन सुप्रसिद्ध और लोकप्रिय उपन्यासों को लिया है- आवा, एक ज़मीन अपनी , माधवी कन्नगी। उनकी गहन पड़ताल की है तथा नारी के मन उनकी सोच को परत-दर परत परखा है। यह काम बहुत बड़ा है और इसके लिए आपकी सोच उस उन्नत स्तर की होनी चाहिए जहां आप नारी मन की थाह ले सकें। चित्रा मुद्गल जी हमारे युग की एक महान लेखिका हैं जिन्होंने बृहद रूप से स्त्री के अधिकारों, स्त्री की आज की स्थिति पर निर्बाध रूप से अपनी लेखनी चलाई है। डॉ सीमा ने अपनी पुस्तक में चित्रा जी के इसी लेखन का चित्रण किया है। यह पुस्तक मात्र पुस्तक नहीं बल्कि चित्रा जी के लेखन को समझने का एक जरिया है। यह पुस्तक आगामी साहित्य प्रेमी और स्त्री विमर्श (फेमिनिज़्म) के पैरोकारों के लिए ‘लाइट हाउस’ का काम करेगी।
चित्रा जी के तीन खंडों में कहानी संग्रह आदि-अनादि आपको अंदर तक उद्वेलित कर पाने में समर्थ है बशर्ते आप में अभी ‘सेंसिटिविटी’ जीवित है। आज के वक़्त में सबसे बड़ा नुकसान इंसान का हुआ है तो यही है कि उसकी भावनाएं कुंद हो गईं हैं। भोंथरी हो गई है। जिसे अंग्रेजी में ‘ब्लंट’ होना कहते हैं। हम एक ऐसे दौर से दो-चार हो रहे हैं जहां अब हमें किसी बात पर ताज्जुब नहीं होता।
इस दौर में अपने कालजयी लेखन की मार्फत चित्रा जी इंसानी मन खासकर स्त्री के मन में घुस कर उसके दुख दर्द उसके ग़म उसकी खुशी की बात करतीं हैं। समाज में नारी को सदैव एक ऐसी नज़र से देखा है जैसे वह कोई निरीह प्राणी है और मर्द का जन्म उसकी रक्षा, उसे दुनियादारी सिखाने के लिए ही हुआ है। वह अपनी इस ‘सेल्फ ऑपेइंटिड गार्जियन’ की छवि को किसी भी तरह नुकसान नहीं होने देना चाहता। वहाँ भी नहीं जहां वह खुद अपनी स्त्री, अपनी पुत्री पर निर्भर है। समाज में उसने ज़ुमले भी वैसे ही गढ़ लिए हैं …’यह मेरी बेटी नहीं बेटा है’। ‘यह मेरी बेटी नहीं राजा बेटा है’। सारी कसरत इसलिए कि कैसे तो भी बेटी को बेटे के बराबर ले आओ और बस अपने कर्तव्य की इतिश्री। हो गया नारी सशक्तिकरण। नारी के मन की किसी ने न जानी। चित्रा जी का समग्र लेखन इसी दिशा में एक बेहद ईमानदार कोशिश है। डॉ सीमा की रिसर्च, चित्रा जी के इसी लेखन में गहरे उतर कर मोती ढूंढ लाने की है। उनकी पी.एच.डी. इसी पर है। यद्यपि वे वर्तमान में कई विश्वविद्यालयों में बतौर विजिटिंग प्रोफेसर अध्यापन में रत हैं।
(पुस्तक चित्रा मुदगल के कथा साहित्य में स्त्री विमर्श जी.एस. पब्लिशर्स और डिस्ट्रीब्युटर्स, शाहदरा, दिल्ली द्वारा प्रकाशित, मूल्य 595/-)

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