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संपादकीय : पहलगाम हत्याकांड की बरसी… क्या न्याय हुआ?

पहलगाम, जम्मू-कश्मीर में हुए भीषण आतंकवादी हमले को बुधवार को एक वर्ष पूरा हो गया। यह राक्षसी हमला भारत के माथे पर एक रिसता हुआ जख्म है और इस हमले की वेदना और चुभन एक साल बाद भी रत्ती भर भी कम नहीं हुई है। २२ अप्रैल २०२५ को दोपहर ढाई बजे के करीब, भारतीय सेना की वर्दी पहनकर आए आतंकवादियों ने पहलगाम में पर्यटकों के खून की नदियां बहा दीं। धर्म पूछ-पूछकर हिंदू पर्यटकों को चुन-चुनकर मार डाला गया। पृथ्वी पर स्वर्ग के रूप में जानी जाने वाली कश्मीर की पहलगाम स्थित बैसरन घाटी, जो ‘मिनी स्विट्जरलैंड’ कहलाती है, वहां अपने परिवार के साथ पर्यटन के लिए आए लोगों को आतंकवादियों ने ‘निशाना’ बनाया। इस कायरतापूर्ण हमले में आतंकवादियों ने २६ निर्दोषों की क्रूरता पूर्वक हत्या कर दी। २०१९ में पुलवामा में सीआरपीएफ जवानों के काफिले पर हुए आतंकवादी हमले के बाद, जम्मू-कश्मीर में यह सबसे बड़ा हमला था। इस हमले के बाद भारतीय सेना ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ चलाकर पाकिस्तान स्थित आतंकवादी ठिकानों और पाकिस्तानी सेना के कई अड्डों पर जबरदस्त हमला किया। तीन दिनों तक भारत-पाक के बीच युद्ध की ज्वाला धधकती रही। भारतीय सेना ने अद्भुत शौर्य दिखाते हुए पाकिस्तान के कई सैन्य ठिकानों को ध्वस्त कर दिया। इस घमासान को देखते हुए देशवासियों को लग रहा था कि इस युद्ध में पाकिस्तान का एक ही बार में अंतिम पैâसला हो जाएगा, लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ। युद्ध अल्पकालिक रहा और वह रहस्यमयी था। जब ऐसा लग रहा था कि आतंकवादियों को पालने वाले और भारत में बार-बार आतंकवादी हमले करानेवाले
पाकिस्तान की हेकड़ी
हमेशा के लिए मिटाकर ही ‘ऑपरेशन सिंदूर’ रुकेगा, तभी अचानक ऑपरेशन स्थगित करने की घोषणा हो गई। जब भारतीय सेना पाकिस्तान में घुसकर दुश्मन को तहस-नहस कर रही थी, तभी पहले अमेरिका ने युद्धविराम की घोषणा की। उसके तुरंत बाद भारत-पाक के सैन्य अधिकारियों ने भी युद्धविराम घोषित कर दिया। पहलगाम हत्याकांड का बदला लेने के साथ-साथ पाकिस्तान के और टुकड़े करने का जो अवसर मिला था, वह युद्धविराम के कारण हमने गवां दिया; ऐसी भावना उस समय देशभर में उमड़ी और वह टीस आज भी भारतीयों के मन में बरकरार है। ‘भारत और पाकिस्तान पर व्यापार प्रतिबंध लगाने की धमकी देकर मैंने यह युद्ध रुकवाया,’ ऐसा अमेरिका के बड़बोले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कम से कम सौ बार कहा। हालांकि, राष्ट्रपति ट्रंप के इस दावे का भारत ने वैसा प्रतिवाद नहीं किया जैसा करना चाहिए था। हालांकि, युद्धविराम के बाद से पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसीम मुनीर राष्ट्रपति ट्रंप के चहेते बन गए। मुनीर का ‘व्हाइट हाउस’ में लाल कालीन बिछाकर अमेरिका ने स्वागत किया। ट्रंप और मुनीर के बीच दावतें उड़ीं और दूसरी ओर भारत पर अमेरिका ने दमनकारी टैरिफ लगा दिया। पहलगाम हत्याकांड के बाद दुनिया ने देखा कि अमेरिका ने खुलेआम पाकिस्तान को अपनी गोद में बिठा लिया है। जब अमेरिका यह पक्षपात कर रहा था, तब भारत ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ और पाकिस्तान की आतंकवादी गतिविधियों के संदर्भ में दुनियाभर के देशों में सर्वदलीय
सांसदों के प्रतिनिधिमंडल
भेजकर अपना पक्ष रखने की कोशिश की। लेकिन इनमें से कितने देशों ने खुलकर भारत का पक्ष लिया? यह आज भी एक प्रश्न ही है। पहलगाम हत्याकांड के बाद पाकिस्तान किस तरह एक आतंकवादी और गैर-जिम्मेदार राष्ट्र है, यह वैश्विक समुदाय को समझाने में और पाकिस्तान को अलग-थलग करने की कूटनीति में कहीं न कहीं कमियां जरूर रहीं। पहलगाम हत्याकांड के बाद राष्ट्रपति ट्रंप की भारत और हमारे प्रधानमंत्री पर गुर्राहट बढ़ गई। इसके विपरीत, ईरान-इजरायल और अमेरिका युद्ध में शांति वार्ता के लिए मध्यस्थता की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी ट्रंप ने पाकिस्तान को सौंप दी। पहलगाम के क्रूर हत्याकांड को एक वर्ष पूरा होने पर, इस आतंकवादी हमले को अंजाम देनेवाले पाकिस्तान को वैश्विक स्तर पर अमेरिका द्वारा प्रतिष्ठा दिया जाना चिंताजनक है। पाकिस्तान से २०० किलोमीटर की दूरी तय कर आतंकवादी पहलगाम में कैसे घुसे और बैसरन घाटी में अंधाधुंध गोलीबारी कर २६ निर्दोषों को मारने तक इन आतंकवादियों को कहीं भी किसी ने क्यों नहीं रोका? इसका उत्तर आज भी नहीं मिला है। हमला कर हत्यारे जंगल के रास्ते कहां और कैसे गायब हो गए? यह भी एक पहेली ही है। क्या पहलगाम में मासूम पर्यटकों का नरसंहार करने वाले हत्यारे आतंकवादियों और उनके आकाओं को खत्म करके हमने पूर्ण न्याय किया? वेदना में डूबे पहलगाम नरसंहार की पहली बरसी पर, ऐसे कई सवाल अनुत्तरित रह गए हैं!

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