राजन पारकर / मुंबई
राज्य में ‘जल प्रबंधन पखवाड़ा’ के नाम पर बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, लेकिन हकीकत में गांव-गांव में पानी की किल्लत से जनता परेशान है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में “गोदा से नर्मदा पुण्यश्लोक अहिल्यादेवी होलकर जल यात्रा 2026” का जोरदार प्रचार हो रहा है, मगर यह सब दिखावा है या समाधान? यह सवाल अब आम जनता पूछ रही है।
पुण्यश्लोक अहिल्याबाई होळकर के नाम पर जल यात्रा निकालकर पानी प्रबंधन का आदर्श पेश करने का दावा जलसंधारण मंत्री राधाकृष्ण विखे पाटील ने किया है लेकिन सच्चाई कुछ और ही बयां करती है। कई इलाकों में आज भी टैंकरों पर निर्भर गांव, सूखे कुएं और अधूरे प्रोजेक्ट—क्या सरकार का ध्यान इस ओर है? चौंडी और त्र्यंबकेश्वर मंदिर से भव्य शुभारंभ, 108 कन्याओं का पूजन, जल कलश और बड़े-बड़े मंच—इन सब पर खर्च होने वाले करोड़ों रुपये का हिसाब कौन देगा? पानी बचाने के लिए कार्यक्रम या कार्यक्रम के लिए पानी? यह तंज अब विरोधियों की ओर से भी उठ रहा है। शिर्डी से लेकर घृष्णेश्वर मंदिर तक की यह यात्रा भले ही ‘जनजागरण’ के नाम पर हो, लेकिन किसानों के खेतों तक पानी पहुंचाने के लिए क्या ठोस कदम उठाए गए—यह सवाल अभी भी अनुत्तरित है। 500 जल यात्रियों का उत्साह और सरकार का प्रचार एक तरफ, तो दूसरी ओर आम आदमी आज भी एक बाल्टी पानी के लिए लाइन में खड़ा है—यह सच्चाई कोई नकार नहीं सकता। “यात्रा बंद करो, पानी दो!” -जनता का सीधा सवाल अब सरकार के सामने खड़ा है।
