खाशाबा जाधव को ‘पद्म’ पुरस्कार से सम्मानित कराने एवं महाराष्ट्र की मिट्टी की कुश्ती का गौरव बढ़ाने के लिए लगातार प्रयास जारी हैं। खाशाबा कुश्ती के क्षेत्र में एक असाधारण नाम थे। १९५२ के हेलसिंकी ओलिंपिक में उन्होंने भारत के लिए पहला व्यक्तिगत कांस्य पदक जीता था। जाधव का सारा जीवन संघर्ष और परिस्थितियों से लड़ने में बीता। वह समय ऐसा था जब खिलाड़ियों को न तो सम्मान मिलता था और धन का तो सवाल ही नहीं उठता था। मेजर ध्यानचंद हॉकी में और खाशाबा कुश्ती में बड़ा नाम कमा चुके थे। भारत को तब नई-नई आजादी मिली थी और पूरा देश राष्ट्र निर्माण के काम में जुटा था। जिसके चलते खेल और खिलाड़ियों की ओर अधिक ध्यान नहीं रहा। इस कारण ओलिंपिक में कांस्य पदक जीतने के बावजूद खाशाबा जाधव उपेक्षित रहे। खाशाबा का निधन १९८४ में हुआ। उसके बाद २००१ में उन्हें मरणोपरांत अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह पुरस्कार उन्हें जीवित रहते भी दिया जा सकता था, लेकिन खाशाबा के लिए ‘लॉबिंग’ करने वाला कोई नहीं था। अब खाशाबा को मरणोपरांत ‘पद्म’ पुरस्कार मिले, ऐसे प्रयास उनके प्रशंसक पिछले पांच-दस वर्षों से कर रहे हैं। जब यह दिखा कि महाराष्ट्र सरकार को खाशाबा का सम्मान करने की इच्छा नहीं हुई, तब उनके प्रशंसक अदालत गए और मुंबई उच्च न्यायालय ने खाशाबा को ‘पद्म’ पुरस्कार देने के संबंध में २० दिनों के भीतर निर्णय लेने का आदेश दिया। इसलिए अब देखना होगा कि केंद्र सरकार क्या करती है। आजकल सभी प्रकार के और
सभी क्षेत्रों के पुरस्कारों
की थोक खरीद-बिक्री जैसा दृश्य दिखाई देता है। फिल्मी अभिनेताओं का कौशल देखे बिना ही उन्हें ‘पद्म’ सम्मान दे दिए जाते हैं। वे सिर्फ भाजपा के मंच पर हाजिरी लगाकर ‘जी हुजूरी’ करते हैं न? बस यही है क्वॉलिफिकेशन। सार्वजनिक क्षेत्र में ठोस काम करने के नाम पर राजनेता, दानदाता, उद्योगपति, सोशल मीडिया के सेलिब्रिटी और सेवानिवृत्त प्रशासनिक अधिकारी जैसे किसी को भी ‘पद्म’ और ‘छद्म’ पुरस्कार दिए जाते हैं। किसी ने जरा अच्छा गाना गा लिया, किसी की एकाध फिल्म चल गई, या ‘धुरंधर’, ‘कश्मीर फाइल्स’, ‘केरल फाइल्स’ जैसी प्रचारक फिल्में चलानेवालों को ‘पद्म’ का बहुमान मिल ही जाता है। स्वयं प्रधानमंत्री ही उनका प्रचार करते हैं। अक्षरश: पुरस्कारों की बरसात होती है। क्रिकेट के मैदान पर एक शतक ठोकने पर भी मान-धन और पदकों की कतार लग जाती है, लेकिन जिस कुश्तीबाज ने १९५२ में स्वतंत्र भारत को पहला ओलिंपिक पदक दिलाया, जिसने दुनिया को बताया कि भारत में कुश्ती है, भारत में शक्ति है, उन खाशाबा जाधव को ७४ वर्षों के बाद भी ‘पद्म’ पुरस्कार नहीं मिला, यह महाराष्ट्र के लिए शर्मनाक बात है। यदि महाराष्ट्र की ओर से खाशाबा के नाम की पुरजोर सिफारिश की गई, तो केंद्र सरकार खाशाबा को ‘पद्म’ पुरस्कार देगी ही देगी। फडणवीस सरकार ने ऐसी सिफारिश अभी तक नहीं की है, इसलिए खाशाबा को
‘पद्म’ पुरस्कार से वंचित
रहना पड़ा। जब खाशाबा ने ओलिंपिक पदक जीता था, तब भारतीय जनता पार्टी का जन्म भी नहीं हुआ था। इसलिए भाजपा की चमचागीरी करके ‘पद्म’ पाने का सवाल ही पैदा नहीं होता। सच तो यह है कि तत्कालीन कांग्रेस सरकार को ही खाशाबा को तभी ‘पद्म’ से सम्मानित करना चाहिए था। आज के ‘अमृत काल’ में ‘पद्म’ पुरस्कारों की गुणवत्ता क्या है? तो बस चमचागीरी। जिन्हें गुणी जन मानकर सम्मानित किया जाता है, यदि वे उनके विचारों या प्रचार में दिखते हैं तो आपको ‘पद्म’ क्या, ‘भारत रत्न’ भी मिल जाएगा। अयोध्या के राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा का ‘मुहूर्त’ निकालने वाले गुरुजी को भी मोदी सरकार ने ‘पद्म’ पुरस्कार दिया ही, लेकिन जिन्होंने देश को खेल के वैश्विक मानचित्र पर लाया, कुश्ती को राष्ट्रप्रेम का प्रतीक बनाया, वे खाशाबा आज भी ‘पद्म’ पुरस्कार की कतार में खड़े हैं। यदि खरात बाबा पकड़ा नहीं जाता, तो आंकड़ा विशेषज्ञ ज्योतिषाचार्यों की श्रेणी में उसे भी पद्मश्री पुरस्कार से निश्चित ही सम्मानित किया गया होता। खाशाबा जाधव १९८४ में एक सड़क दुर्घटना में दुनिया छोड़ गए। उन्होंने कभी कोई अपेक्षा नहीं रखी, सरकार के सामने हाथ नहीं पैâलाए। खाशाबा के नाम पर कुछ संस्थाएं खड़ी हुर्इं। उन संस्थाओं ने ‘पद्म’ पुरस्कार की मांग की और मामला हाई कोर्ट तक गया। हाई कोर्ट ने केंद्र को निर्देश दिए। जब पुरस्कारों की लूट मची है, तब खेल जगत का असली हीरो ‘पद्म’ पुरस्कार से दूर ही रहा। यह महाराष्ट्र और केंद्र सरकार की कृतघ्नता है। खाशाबा का राष्ट्रीय सम्मान होना ही चाहिए। उसके लिए कम से कम महाराष्ट्र की सभी तालीमों (अखाड़ों) और कुश्तीबाजों को ताल ठोकना चाहिए।
