राजेश सरकार / प्रयागराज
सरकारी मुफ्त राशन योजना जो जरूरतमंदों के लिए सहारा बननी चाहिए। अब कई गांवों में सवालों के घेरे में है। सोरांव तहसील के पिपरांव, हरीडीह (होलागढ़) और ककरा जैसे गांवों से सामने आई शिकायतें बताती हैं कि लाभार्थियों को निर्धारित मात्रा से कम राशन दिया जा रहा है। वो भी बायोमेट्रिक सत्यापन के बाद। पिपरांव गांव में कोटेदार रूपा देवी और हरीडीह (इमामकुलीपुर) में सोना देवी पर आरोप है कि प्रति यूनिट 1 किलो तक राशन कम दिया जा रहा है। ग्रामीणों ने इसकी शिकायत दर्ज कर जांच की मांग की है। वहीं ककरा गांव में जांच के बाद अनियमितताएं सही पाई गईं जिसके चलते कोटेदार का कोटा निलंबित कर दिया गया। जो यह साबित करता है कि शिकायतें बेबुनियाद नहीं हैं। जमीनी हकीकत यह है कि बायोमेट्रिक मशीन पर अंगूठा लगने के बाद भी कई उपभोक्ताओं को पूरा राशन नहीं मिल रहा। कहीं 1–2 किलो कम तौल, तो कहीं ‘आज इतना ही आया है’ जैसे बहाने। ये सब मिलकर गरीब के हिस्से में कटौती कर रहे हैं। सवाल यह भी है कि क्या तकनीक सिर्फ उपस्थिति दर्ज करने तक सीमित है या पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए भी जिम्मेदार है?
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 के तहत हर पात्र व्यक्ति को प्रति माह 5 किलो और अंत्योदय कार्डधारकों को 35 किलो राशन मिलना कानूनी अधिकार है। इसके बावजूद बार-बार सामने आ रही घटतौली यह संकेत देती है कि निगरानी तंत्र कहीं न कहीं कमजोर है। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 के अनुसार ऐसी घटतौली अनुचित व्यापार प्रथा की श्रेणी में आती है, जिसमें सख्त कार्रवाई का प्रावधान है। लेकिन जमीनी स्तर पर कार्रवाई की रफ्तार अक्सर शिकायतों से पीछे दिखती है। यही वजह है कि ग्रामीणों में असंतोष बढ़ रहा है।
बड़े सवाल अब भी कायम
क्या निगरानी समितियां सिर्फ कागजों में सक्रिय हैं? क्या इलेक्ट्रॉनिक तौल मशीनें केवल औपचारिकता बनकर रह गई हैं? और सबसे अहम गरीब का हक आखिर किस स्तर पर कट रहा है? इस पूरे मामले में प्रशासन की जिम्मेदारी सिर्फ जांच तक सीमित नहीं हो सकती। नियमित निरीक्षण, सोशल ऑडिट, पारदर्शी वितरण व्यवस्था और दोषियों पर त्वरित कार्रवाई ही भरोसा बहाल कर सकती है। साथ ही लाभार्थियों को भी अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होना होगा—ताकि ‘जो मिला, वही सही’ की मजबूरी खत्म हो।
