भरतकुमार सोलंकी
मुंबई
रिटायरमेंट प्लानिंग आखिर जरूरी क्यों है? क्या यह सिर्फ नौकरीपेशा लोगों के लिए होती है, या छोटे दुकानदार, व्यापारी और स्वरोजगार करने वाले लोगों के लिए भी उतनी ही जरूरी है? और सबसे बड़ा सवाल- क्या ‘व्यापारी कभी रिटायर्ड नहीं होता’ यह वास्तव में गर्व की बात है या मजबूरी छुपाने का एक बहाना? जरा सोचिए, विदेशों में माता-पिता अपने बच्चों पर आर्थिक रूप से निर्भर क्यों नहीं रहते? क्योंकि वहां लोग अपनी कमाई के शुरुआती वर्षों से ही रिटायरमेंट प्लानिंग को जीवन का अनिवार्य हिस्सा मानते हैं। वे यह समझते हैं कि बच्चों को जन्म देना और बच्चों पर निर्भर रहना दो अलग बातें हैं। लेकिन हमारे देश में अधिकतर छोटे व्यापारी पूरी जिंदगी दुकान और धंधे में उलझे रहते हैं, पर अपने भविष्य के लिए अलग से पूंजी निर्माण नहीं कर पाते। आखिर ऐसा क्यों?
क्या इसका कारण यह नहीं कि अधिकांश छोटे व्यापारी अपनी पूरी कमाई को ‘धंधे का पैसा’ मानकर उसी में घुमाते रहते हैं? अगर किसी व्यापारी को ६५-७० वर्ष की उम्र में भी रोज दुकान खोलनी पड़ रही है, हिसाब-किताब देखना पड़ रहा है और बच्चों के सामने हाथ पैâलाने का डर बना हुआ है, तो क्या यह आर्थिक स्वतंत्रता कहलाएगी? आज समय तेजी से बदल रहा है। बच्चों की सोच बदल रही है। नई पीढ़ी शायद पारंपरिक दुकानदारी में बैठना नहीं चाहती। वे दूसरे शहरों में नौकरी करेंगे, नए क्षेत्रों में करियर बनाएंगे। ऐसे में सवाल यह है मां-बाप आखिर कितनी उम्र तक दुकान संभालेंगे? यहीं रिटायरमेंट प्लानिंग की असली जरूरत शुरू होती है। सबसे पहले व्यापारी को ‘जरूरतमंद मानसिकता’ से बाहर निकलना होगा। क्योंकि जब तक इंसान हर समय जरूरतों और कर्जों में फंसा रहेगा, तब तक वह भविष्य के लिए पूंजी निर्माण नहीं कर सकता। आज रिटायरमेंट के लिए बचाया पैसा कल घर खरीदने में टूट जाता है, कभी कर्ज चुकाने में, तो कभी बच्चों की शादी में। तो समाधान क्या है? समाधान यह है कि व्यापारी अपने व्यवसाय को ‘प्रोफेशनल’ तरीके से चलाना शुरू करे। जैसे बड़ी कंपनियां अपने मालिकों को नियमित सैलरी देती हैं, वैसे ही छोटे व्यापारी को भी अपने लिए निश्चित आय तय करनी होगी। हर महीने नियमित निवेश करना होगा। धंधे और निजी जिंदगी के पैसों को अलग रखना होगा। और सबसे जरूरी-रिटायरमेंट को ‘बुढ़ापे की मजबूरी’ नहीं, बल्कि ‘आर्थिक स्वतंत्रता’ के रूप में देखना होगा। क्योंकि सच्चाई यही है जो व्यक्ति समय रहते रिटायरमेंट की योजना नहीं बनाता, उसे उम्र के आखिरी पड़ाव में मजबूरी का जीवन जीना पड़ सकता है। और अंत में एक सवाल- क्या आप जिंदगी भर सिर्फ धंधा चलाना चाहते हैं या एक दिन सम्मान के साथ आर्थिक रूप से स्वतंत्र होकर जीना भी चाहते हैं?
(लेखक आर्थिक निवेश मामलों के विशेषज्ञ हैं)
