श्रीकिशोर शाही
(सत्ता में सुंदरी की घुसपैठ-९)
मिस इंडिया का चमकता ताज पामेला के सिर पर जरूर सज गया था, लेकिन उसकी निगाहें अभी भी सात समंदर पार टिकी थीं। यह ताज उसके लिए महज एक टिकट था। उस बड़ी और चकाचौंध से भरी दुनिया का टिकट, जिसकी वह हमेशा से कल्पना करती थी। जल्द ही उसे वह बड़ा मौका मिल गया, जब १९८२ की ‘मिस यूनिवर्स’ प्रतियोगिता में भारत का प्रतिनिधित्व करने की जिम्मेदारी उसके नाजुक कंधों पर आ गई।
यह अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता दक्षिण अमेरिका के पेरू में आयोजित हो रही थी। जब पामेला ने पहली बार उस विदेशी धरती पर कदम रखा तो वह एक बिल्कुल अलग दुनिया थी। वहां का भव्य ग्लैमर, विश्व भर से आई सबसे खूबसूरत युवतियां, चमकते वैâमरे और शानदार पार्टियां, सब कुछ उसकी उम्मीदों से कहीं ज्यादा विशाल और लुभावना था। यह वह मंच था जहां पामेला को पहली बार एहसास हुआ कि वह वास्तव में इसी असीम और भव्य दुनिया के लिए ही बनी है। प्रतियोगिता के दौरान अपने बेबाक अंदाज से उसने अंतर्राष्ट्रीय मीडिया और पैâशन के दिग्गजों का ध्यान अपनी ओर खींचा। हालांकि, वह मिस यूनिवर्स का ताज अपने नाम नहीं कर सकी, लेकिन इस हार ने उसे निराश करने के बजाय एक नई आग से भर दिया।
ताज न जीत पाने का मलाल पीछे छूट गया था, क्योंकि पामेला ने वहां कुछ और ही जीत लिया था, एक नई और बड़ी महत्वाकांक्षा। विदेशी जीवनशैली की उस छोटी सी झलक ने उसके भीतर एक गहरा असर छोड़ा था। वहां की आजाद आबोहवा, महंगे ब्रांड्स, और रसूखदार लोगों के बीच उठना-बैठना उसे बहुत रास आ गया था। जब वह प्रतियोगिता खत्म होने के बाद वापस भारत लौटी तो उसे अचानक अपना देश, यहां की मॉडलिंग इंडस्ट्री और यहां की शोहरत बहुत छोटी और सीमित लगने लगी थी।
मिस इंडिया की सफलता अब पामेला के लिए बीते कल की बात हो चुकी थी। उसका मन अब दिल्ली या मुंबई की सड़कों पर नहीं लगता था। विदेशी चकाचौंध ने उसे एक ऐसा नशा दे दिया था, जिसे अब किसी भी कीमत पर पूरा करना था। उसने अपने मन में एक बेहद अहम पैâसला कर लिया था, भारत अब उसके बड़े सपनों को पूरा करने के लिए बहुत छोटा है। उसकी असली मंजिल अब पश्चिम था। पामेला ने अपने पंख पूरी तरह पैâलाने का पक्का निश्चय कर लिया था और अब उसकी अगली उड़ान सीधे यूरोप के हाई-सोसायटी और ग्लैमर की दुनिया की ओर होने वाली थी, जहां से उसकी जिंदगी का असली और सबसे रहस्यमयी अध्याय शुरू होने वाला था।
(शेष अगले अंक में)
