मुख्यपृष्ठस्तंभसरहद पार से अलगाव की हवा!

सरहद पार से अलगाव की हवा!

अनिल तिवारी
ध्रुवीकरण की राजनीति जब भीतर आग लगाती है, तो बाहर बैठे कट्टरपंथी भी उसमें घी डालने लगते हैं। यह राजनीति कितनी खतरनाक होती है, यह भारत ने १९४७ में देखा है। ऑल इंडिया मुस्लिम लीग की स्थापना भी १९०६ में ढाका में हुई थी। मोहम्मद अली जिन्ना उसके सबसे बड़े नेता बने और धार्मिक पहचान की राजनीति अंतत: देश के विभाजन तक पहुंची। पाकिस्तान बना, फिर १९७१ में बांग्लादेश बना। यानी धर्म के नाम पर बोया गया बीज उपमहाद्वीप को बार-बार तोड़ता रहा।
आज वही खतरा नए रूप में लौटता दिख रहा है। भारत में आक्रामक धार्मिक राजनीति ने असदुद्दीन ओवैसी जैसे नेताओं को अनावश्यक राजनीतिक ऊंचाई दी है। ध्रुवीकरण ने उन्हें मुसलमानों की अलग आवाज के रूप में खड़ा होने का अवसर दिया।
अब बांग्लादेश से आई एक विवादित सोशल मीडिया पोस्ट ने इस चिंता को और गंभीर बना दिया है। बांग्लादेश जुलाई जोद्धा संसद के अध्यक्ष मोहम्मद नूरुल हुदा ड्यूक ने ममता बनर्जी से ‘दिल्ली के शासन’ को खारिज कर पश्चिम बंगाल को स्वतंत्र राज्य घोषित करने की अपील की और दावा किया कि ऐसा होने पर बांग्लादेश के १७ करोड़ लोग उनके साथ खड़े होंगे। चुनाव परिणाम के बाद जारी हिंसा के बीच मोहम्मद नूरुल हुदा ड्यूक ने सोशल मीडिया पर ममता बनर्जी को संबोधित करते हुए एक पोस्ट शेयर किया। इसमें उसने ममता को बीजेपी को सत्ता नहीं सौंपने के साहसिक पैâसले के लिए बधाई दी और आगे बढ़कर ‘दिल्ली के शासन’ को अस्वीकार करते हुए पश्चिम बंगाल को स्वतंत्र राज्य घोषित करने का आह्वान किया। इस बयान पर विवाद खड़ा हुआ है। यह बयान किसी एक व्यक्ति की सनक मानकर खारिज किया जा सकता है, लेकिन राजनीति को इससे चेतना चाहिए। जब देश के भीतर धर्म और जाति के नाम पर समाज को बांटा जाता है, तब सरहद पार की कट्टरपंथी ताकतें भी ऐसे माहौल का लाभ उठाने लगती हैं। अलगाव की भावना को हवा देने लगती हैं।

ढाका में बेचैनी और फिल्मी फाइलों की वापसी
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा की जीत के बाद ढाका से लेकर कोलकाता तक बयानबाजी की नई खेप बाजार में आ गई है। बांग्लादेश की विपक्षी पार्टी के चीफ व्हिप नाहिद इस्लाम समेत कई नेताओं को अब बंगाल की राजनीति में अपनी बेचैनी दिखने लगी है। दिल्ली में केंद्र और कोलकाता में राज्य, दोनों जगह भाजपा की मौजूदगी ने ‘डबल इंजन’ की चर्चा को ऐसा धक्का दिया है कि सीमापार भी राजनीतिक तापमान चढ़ गया है। ढाका की लेखिका और पत्रकार जन्नतुल नईम के अनुसार, चुनावी नतीजों के बाद हिंसा की खबरों ने बांग्लादेश में चिंता बढ़ाई है। हालांकि, भाजपा नेतृत्व अपने कार्यकर्ताओं को शांति और संयम का पाठ पढ़ा रहा है, लेकिन सोशल मीडिया की अपनी संसद है, वहां तस्वीरें, बयान और अफवाहें मिलकर पूरा माहौल बना ही देती हैं। इसी बीच विवेक अग्निहोत्री की ‘द बंगाल फाइल्स’ भी फिर सुर्खियों में है। पहले चर्चा थी कि फिल्म ८ मई को बंगाल में रिलीज होगी, लेकिन अग्निहोत्री ने साफ किया कि फाइल १५ मई को खुलेगी। फिल्म पहले बॉक्स ऑफिस पर ठंडी रही, पर बंगाल की बदली राजनीति ने इसे फिर गरम बहस का विषय बना दिया है।

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