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`राइट टू नो द टाइप ऑफ एयरक्राफ्ट’ …अधिकार क्यों नहीं? … रेल सुरक्षा में भी हो पारदर्शिता; ये विकल्प नहीं, आवश्यकता

अनिल तिवारी

चीन ईस्टर्न एयरलाइंस के २०२२ के हादसे की जांच से सामने आई ताजा जानकारी ने दुनिया की विमानन सुरक्षा व्यवस्था को फिर से कटघरे में खड़ा कर दिया है। अमेरिकी एजेंसी एनटीएसबी से जुड़े निष्कर्षों के अनुसार, चीन ईस्टर्न के बोइंग ७३७-८०० विमान के दोनों इंजनों की ईंधन आपूर्ति दुर्घटना से पहले बंद हो गई थी। विमान २९,००० फीट की ऊंचाई पर था और उसके फ्यूल स्विच ‘रन’ से ‘कटऑफ’ स्थिति में चले गए थे। इस हादसे में १३२ लोगों की मौत हुई थी। रिपोर्ट में किसी तकनीकी खराबी का स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलने की बात सामने आई है, जबकि चीन की एजेंसी सीएएसी ने अब तक विस्तृत अंतिम रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की है। यही कारण है कि यह मामला केवल चीन तक सीमित नहीं रह गया। भारत में एयर इंडिया एआई-१७१ हादसे की याद फिर ताजा हो गई है।
१२ जून २०२५ को अमदाबाद से लंदन गैटविक जा रहा एयर इंडिया का बोइंग ७८७-८ ड्रीमलाइनर टेकऑफ के तुरंत बाद दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। भारत के एयरक्राफ्ट एक्सीडेंट इन्वेस्टिगेशन ब्यूरो यानी एएआईबी की प्रारंभिक रिपोर्ट के अनुसार, विमान के दोनों इंजनों के फ्यूल कंट्रोल स्विच टेकऑफ के कुछ सेकंड बाद ‘रन’ से ‘कटऑफ’ स्थिति में चले गए थे। इससे दोनों इंजनों की शक्ति घटने लगी और विमान को संभलने का पर्याप्त समय नहीं मिला। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि एआई-१७१ हादसे की अंतिम जांच रिपोर्ट अभी जारी नहीं हुई है। भारत सरकार के पीआईबी ने १२ फरवरी २०२६ को स्पष्ट किया था कि एआई-१७१ जांच को अंतिम बताने वाली खबरें गलत और अटकलबाजी हैं। एएआईबी ने कहा कि जांच अभी जारी है और कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं निकला है। इसलिए इस समय किसी पायलट, कंपनी, तकनीकी व्यवस्था या मानवीय गलती को अंतिम दोषी ठहराना न्यायसंगत नहीं होगा, परंतु इतना निश्चित है कि ये घटनाएं हवाई सुरक्षा में पारदर्शिता और यात्री-अधिकारों पर गंभीर बहस की मांग करती हैं।
आज बैंकों को ग्राहक से केवाईसी मांगने का अधिकार है। प्रशासन नागरिक से पहचान, पता, आय, कर, दस्तावेज और व्यवहार तक की जानकारी मांगता है। सरकारें नागरिक को कहती हैं, ‘अपने ग्राहक को जानो’, ‘अपने नागरिक को पहचानो’, ‘अपनी जोखिम-प्रोफाइल बताओ।’ पर प्रश्न यह है कि जब व्यवस्था को नागरिक को जानने का अधिकार है, तो नागरिक को व्यवस्था को जानने का अधिकार क्यों नहीं? जब यात्री टिकट खरीदता है, तो वह केवल सीट नहीं खरीदता; वह अपनी जान, अपने परिवार की उम्मीद और अपनी सुरक्षा उस परिवहन प्रणाली को सौंपता है। इसलिए उसे यह जानने का अधिकार होना चाहिए कि वह किस प्रकार के विमान में यात्रा करने जा रहा है।
आज कई एयरलाइन वेबसाइटों और यात्रा पोर्टलों पर एयरक्राफ्ट टाइप कभी-कभी दिखाई देता है, लेकिन यह सूचना न तो सार्वभौमिक है, न अनिवार्य, न अंतिम। कई बार ‘इक्विपमेंट चेंज’ के नाम पर विमान बदल दिया जाता है। यात्री को यह बताया जाता है कि विमान बदलना एयरलाइन का परिचालन अधिकार है। यह बात व्यावहारिक रूप से सही हो सकती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि यात्री को सूचना से वंचित रखा जाए। यदि उड़ान से पहले सीट, भोजन, बैगेज, देरी, वैंâसिलेशन और बोर्डिंग-गेट की जानकारी दी जा सकती है, तो एयरक्राफ्ट टाइप, एयरक्राफ्ट एज, रजिस्ट्रेशन नंबर और लास्ट मेजर सेफ्टी इंस्पेक्शन जैसी मूलभूत सुरक्षा-संबंधी जानकारी क्यों नहीं दी जा सकती? भारत में नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने ‘फ्लाई इन्फॉर्म्ड’ के तहत यात्री अधिकारों की बात की है, जिसमें देरी, वैंâसिलेशन, डिनाइड बोर्डिंग और विशेष सहायता जैसे मुद्दे आते हैं। लेकिन अब समय है कि इसमें राइट टू नो द एयरक्राफ्ट टाइप को भी शामिल किया जाए। यह अधिकार केवल जिज्ञासा का विषय नहीं, बल्कि सुरक्षा-संबंधी उपभोक्ता अधिकार है। यात्री को टिकट बुक करते समय साफ दिखाई देना चाहिए कि विमान बोइंग ७३७ है, एयरबस ए३२० है, बोइंग ७८७ है या कोई अन्य मॉडल। साथ ही यह भी बताया जाना चाहिए कि यह जानकारी परिचालन कारणों से बदल सकती है, लेकिन बदलाव होने पर यात्री को एसएमएस, ईमेल और ऐप नोटिफिकेशन के माध्यम से तुरंत सूचना दी जाएगी। यह अधिकार किसी एक कंपनी के खिलाफ अभियान नहीं है। बोइंग हो या एयरबस, एम्ब्रेयर हो या एटीआर, हर निर्माता की अपनी तकनीकी विशेषताएं, दुर्घटना-इतिहास और सुधार-यात्रा होती है। परंतु यात्री को इतना अधिकार तो होना ही चाहिए कि वह उपलब्ध जानकारी के आधार पर निर्णय ले सके। कोई यात्री बोइंग के कुछ मॉडलों को लेकर आशंकित हो सकता है, कोई एयरबस को अधिक विश्वसनीय मान सकता है, कोई छोटा टर्बोप्रॉप विमान नहीं लेना चाहता होगा। भले ही उसकी आशंका हमेशा तकनीकी रूप से सही न हो, लेकिन निर्णय का अधिकार उसी का होना चाहिए, क्योंकि जोखिम अंतत: वही उठाता है।
इसी सिद्धांत को भारतीय रेल पर भी लागू किया जाना चाहिए। भारत में लंबे समय्ा तक आईसीएफ कोचों का उपयोग होता रहा है। बाद में एलएचबी कोचों को अधिक सुरक्षित और आधुनिक विकल्प के रूप में बढ़ाया गया। रेलवे स्वयं आईसीएफ से एलएचबी कोचों के प्रतिस्थापन और रखरखाव से जुड़े आदेश जारी करता रहा है। आम यात्री को यह जानने का अधिकार क्यों नहीं कि जिस ट्रेन में वह सफर कर रहा है, उसमें आईसीएफ कोच हैं या एलएचबी रैक? यदि किराया समान या लगभग समान है, तो यात्री को सुरक्षा-स्तर की जानकारी भी समान रूप से उपलब्ध होनी चाहिए। रेल आरक्षण करते समय यात्री को कोच श्रेणी, स्लीपर, थ्री एसी, टू एसी, चेयर कार तो दिखाई जाती है, लेकिन कोच डिजाइन या रैक प्रकार की स्पष्ट जानकारी प्राय: नहीं मिलती। जबकि दुर्घटना की स्थिति में कोच की बनावट, एंटी-टेलिस्कोपिक डिजाइन, ब्रेकिंग सिस्टम, झटके को सहने की क्षमता और डिरेलमेंट बिहेवियर अत्यंत महत्वपूर्ण हो सकते हैं। इसलिए राइट टू नो द टाइप ऑफ रेल कोच भी उपभोक्ता अधिकारों में शामिल होना चाहिए।
इसका व्यावहारिक मॉडल सरल हो सकता है। विमान टिकट पर एयरक्राफ्ट मॉडल, रजिस्ट्रेशन नंबर, एयरक्राफ्ट एज, लास्ट मेजर मेंटेनेंस मंथ और सेफ्टी डिस्क्लेमर उपलब्ध कराया जाए। रेल टिकट पर ट्रेन रैक टाइप, एलएचबी, आईसीएफ, वंदे भारत, मेमू, डेमू आदि स्पष्ट लिखा जाए। यदि बदलाव हो, तो यात्री को पहले से सूचना मिले। यह भी बताया जाए कि परिचालन कारणों से अंतिम परिवर्तन संभव है, लेकिन सूचना छिपाई नहीं जाएगी। सरकार चाहे तो डीजीसीए, नागरिक उड्डयन मंत्रालय, बीसीएएस, रेलवे बोर्ड और उपभोक्ता मंत्रालय मिलकर एक संयुक्त ट्रांसपोर्ट सेफ्टी डिस्क्लोजर प्रâेमवर्क बना सकते हैं। इसमें तीन स्तर होने चाहिए। पहला, बुकिंग के समय मूल जानकारी; दूसरा, यात्रा से २४ घंटे पहले अंतिम पुष्टि; तीसरा, यात्रा के बाद शिकायत और सुरक्षा-फीडबैक की व्यवस्था। इससे न केवल यात्री सशक्त होगा, बल्कि कंपनियों और विभागों पर सुरक्षा सुधारने का दबाव भी बनेगा।
यह तर्क दिया जा सकता है कि आम यात्री एयरक्राफ्ट टाइप या कोच टाइप समझता ही नहीं। लेकिन यही तर्क कभी पोषण-लेबल, दवा की एक्सपायरी डेट, बैंक ब्याज दर और मोबाइल एसएआर वैल्यू पर भी दिया जाता था। जब जानकारी उपलब्ध होती है, तब जनता धीरे-धीरे समझ विकसित करती है। पारदर्शिता हमेशा जागरूकता की पहली सीढ़ी होती है।
चीन ईस्टर्न और एयर इंडिया एआई-१७१ जैसे हादसे हमें चेतावनी देते हैं कि दुर्घटना के बाद जांच, मुआवजा और शोक-संदेश पर्याप्त नहीं हैं। असली सुधार दुर्घटना से पहले सूचना, निगरानी और जवाबदेही से आता है। यात्री को यह अधिकार मिलना चाहिए कि वह जान सके वह किस मशीन में बैठ रहा है, उसका सुरक्षा इतिहास क्या है और विकल्प उपलब्ध हैं या नहीं। और उसे सभी विकल्प चुनने का अधिकार होना चाहिए।
लोकतंत्र में नागरिक केवल यात्री नहीं, अधिकार-संपन्न उपभोक्ता भी है। जब जीवन दांव पर हो, तो सूचना विलासिता नहीं, सुरक्षा का मूल अधिकार बन जाती है। इसलिए अब समय आ गया है कि भारत में ‘राइट टू नो द टाइप ऑफ एयरक्राफ्ट’ और ‘राइट टू नो द टाइप ऑफ रेल कोच’ को औपचारिक यात्री-अधिकार के रूप में मान्यता दी जाए। यही पारदर्शिता भविष्य की सुरक्षित यात्रा संस्कृति की नींव रखेगी।

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