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पॉलिटिका : चुनावी जीत के बाद भी गिरती लाशें, क्या सचमुच लोकतंत्र जीता?

के.पी. मलिक
पश्चिम बंगाल एक बार फिर चुनाव जीत गया है, लेकिन लोकतंत्र हार गया है। ७ मई २०२६ को आए विधानसभा चुनाव परिणामों में भारतीय जनता पार्टी ने २०८ सीटों के साथ ऐतिहासिक विजय दर्ज की। तृणमूल कांग्रेस ७९ सीटों पर सिमट गई। राजनीतिक दृष्टि से यह बंगाल की सत्ता में एक युगांतकारी परिवर्तन था। परंतु मतगणना पूरी होने के कुछ ही घंटों के भीतर मध्यमग्राम में चंद्रनाथ दत्त की गोली मारकर हत्या कर दी गई और आसनसोल में कांग्रेस कार्यकर्ता देवदीप चटर्जी को पीट-पीटकर मार डाला गया।
राजनीतिक प्रतिशोध!
यही वह क्षण है जहां एक असहज प्रश्न पूरे देश के सामने खड़ा होता है। यदि चुनाव के बाद भी नागरिक सुरक्षित नहीं हैं तो क्या केवल सत्ता परिवर्तन को लोकतंत्र की विजय कहा जा सकता है?
बंगाल में राजनीतिक हिंसा कोई आकस्मिक घटना नहीं है। यह वहां की राजनीतिक संस्कृति का स्थायी और संस्थागत रूप बन चुकी है। १९७७ में वाम मोर्चा सत्ता में आया, तब भी विरोधियों पर हिंसा हुई। २०११ में ममता बनर्जी ने वामपंथ को हटाया, तब भी हिंसा हुई। २०२१ में भाजपा ने उल्लेखनीय उभार दिखाया, तब भी हिंसा हुई। और अब २०२६ में इतिहास फिर उसी रक्तरंजित चक्र में लौट आया है। इसका अर्थ स्पष्ट है। कि समस्या केवल किसी एक दल की नहीं है। समस्या उस राजनीतिक ढांचे की है, जिसमें सत्ता परिवर्तन लोकतांत्रिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि क्षेत्रीय कब्जे के युद्ध की तरह देखा जाता है। बंगाल में चुनाव सिर्फ सरकार तय नहीं करते, वे स्थानीय शक्ति-संतुलन, आर्थिक नियंत्रण, ठेकेदारी, पुलिसिया संरक्षण और सामाजिक प्रभुत्व भी तय करते हैं इसलिए परिणाम आते ही राजनीतिक प्रतिशोध शुरू हो जाता है।
सबसे गंभीर प्रश्न राज्य पुलिस की भूमिका पर खड़ा होता है। दशकों से बंगाल की पुलिस पर आरोप लगता रहा है कि वह सत्तारूढ़ दल की राजनीतिक छाया में काम करती है। चाहे वाम मोर्चा हो, तृणमूल हो या अब भाजपा, पुलिस का चरित्र सत्ता के अनुसार बदलता दिखाई देता है। यही कारण है कि आम नागरिक के मन में पुलिस के प्रति विश्वास लगातार कमजोर हुआ है। क्या कोई ऐसी पुलिस व्यवस्था, जो वर्षों तक राजनीतिक प्रभाव में रही हो, एक रात में निष्पक्ष हो सकती है? सिर्फ सरकार बदल जाने से संस्थाओं का चरित्र नहीं बदलता। संस्थागत निष्पक्षता प्रशासनिक संस्कृति, संवैधानिक अनुशासन और राजनीतिक इच्छाशक्ति से निर्मित होती है। बंगाल में यह तीनों लगातार कमजोर हुए हैं।
दूसरा प्रश्न निर्वाचन
आयोग से जुड़ा है
भारत का निर्वाचन आयोग अक्सर दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक अभ्यास का गौरवपूर्ण प्रतीक बताया जाता है। लेकिन बंगाल जैसे राज्यों में एक बड़ी विडंबना दिखाई देती है। आयोग मतदान संपन्न करा देता है, परिणाम घोषित कर देता है और फिर मौन हो जाता है। जबकि वास्तविक हिंसा का सबसे खतरनाक दौर अक्सर परिणामों के बाद शुरू होता है। क्या निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारी केवल वोट डलवाने तक सीमित है? यदि चुनाव के बाद नागरिकों की हत्या हो रही है, राजनीतिक कार्यकर्ताओं को घर छोड़ने पड़ रहे हैं, और स्थानीय स्तर पर भय का वातावरण बन रहा है तो क्या आयोग यह कहकर मुक्त हो सकता है कि उसका काम समाप्त हो गया?
लोकतंत्र केवल मतदान की तकनीकी प्रक्रिया नहीं है। लोकतंत्र वह वातावरण है जिसमें नागरिक बिना भय के राजनीतिक विकल्प चुन सके और परिणाम आने के बाद भी सुरक्षित रह सके। यदि परिणाम के बाद प्रतिशोध शुरू हो जाए तो चुनाव प्रक्रिया अधूरी मानी जानी चाहिए। तीसरा और सबसे जटिल प्रश्न केंद्र सरकार की भूमिका पर है।
संविधान का अनुच्छेद ३५५ केंद्र सरकार को यह दायित्व देता है कि वह राज्यों को बाहरी आक्रमण और आंतरिक अशांति से संरक्षित करे तथा यह सुनिश्चित करे कि राज्य सरकारें संविधान के अनुसार चलें। बंगाल में बार-बार होने वाली चुनावी हिंसा क्या ‘आंतरिक अशांति’ की श्रेणी में नहीं आती?
यदि केंद्र सरकार पहले से हिंसा की आशंका जानती थी तो क्या अतिरिक्त केंद्रीय बलों की दीर्घकालिक तैनाती नहीं होनी चाहिए थी?
क्या परिणाम आने के बाद संवेदनशील क्षेत्रों में विशेष निगरानी नहीं होनी चाहिए थी?
और यदि हिंसा फिर भी हुई, तो क्या यह केंद्र और राज्य दोनों की संयुक्त विफलता नहीं है? यहां समस्या केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक भी है। भारत में लगभग हर दल विपक्ष में रहते हुए संस्थाओं की निष्पक्षता की मांग करता है, लेकिन सत्ता में आते ही वही संस्थाओं को अपने प्रभाव क्षेत्र में बदलने लगता है। परिणामस्वरूप लोकतंत्र की संस्थाएं धीरे-धीरे संवैधानिक इकाइयों से राजनीतिक औजारों में परिवर्तित होने लगती हैं।
लोकतंत्र की हत्या
बंगाल की हिंसा इसी व्यापक राष्ट्रीय संकट का प्रतिबिंब है। दरअसल सबसे दुखद बात यह है कि राजनीतिक दल इन मौतों को भी अपने-अपने नैरेटिव में बदल देते हैं। किसी के लिए यह ‘लोकतंत्र की हत्या’ है, किसी के लिए ‘जनाक्रोश’ और किसी के लिए ‘छिटपुट घटना’। लेकिन चंद्रनाथ दत्त और देवदीप चटर्जी के परिवाराें के लिए यह कोई नैरेटिव नहीं, बल्कि जीवनभर का शोक है। दरअसल, एक स्वस्थ लोकतंत्र में चुनाव परिणाम उत्सव का कारण होते हैं। लेकिन यदि परिणाम आने के बाद लोग अपने घर छोड़ने लगें, राजनीतिक कार्यकर्ता छिपने लगें और सड़कों पर खून बहने लगे, तो यह संकेत है कि लोकतंत्र की आत्मा कमजोर हो चुकी है। भारत को यह स्वीकार करना होगा कि केवल चुनाव करवा लेना लोकतंत्र नहीं है। लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ है संस्थाओं की निष्पक्षता, नागरिकों की सुरक्षा, कानून का समान शासन और राजनीतिक प्रतिशोध से मुक्ति। बंगाल आज केवल एक राज्य का संकट नहीं है। यह भारतीय लोकतंत्र के सामने खड़ा वह दर्पण है, जिसमें हमारी संस्थाओं की कमजोरी साफ दिखाई देती है। यदि हर सत्ता परिवर्तन के साथ हिंसा सामान्य होती जाएगी तो आनेवाले समय में चुनाव लोकतांत्रिक उत्सव नहीं, बल्कि संगठित संघर्ष बन जाएंगे। तब प्रश्न केवल यह नहीं रहेगा कि कौन जीता। प्रश्न यह होगा कि लोकतंत्र बचा भी या नहीं।

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