मुख्यपृष्ठस्तंभतरकश : काम भी बन जाए और भरम भी न टूटे

तरकश : काम भी बन जाए और भरम भी न टूटे

धनुर्धर

विरोधियों का कुछ नहीं हो सकता। आप इन्हें कुछ समझा ही नहीं सकते। ये समझेंगे ही नहीं। इनके दिल-दिमाग में एक बात बैठी हुई है कि आप गलत हैं, आपका पैâसला गलत है और ये किसी न किसी उपाय से गलती ढूंढ ही लेते हैं। लाख जतन करके अपनी गलती छुपाइए, ये कोई न कोई तरीका निकाल ही लेंगे उसे ढूंढने का।
उल्टी खोपड़ी वाले
गड़बड़ यही है, वे पहले से माने बैठे हैं कि आप गलत हैं। आप पर, आपके पैâसले पर यकीन ही नहीं करते। आप चाहे कितने भी मीठे शब्दों का इस्तेमाल करिए, इन पर असर नहीं होता। इस लिहाज से देखा जाए तो ये बिल्कुल उल्टी खोपड़ीवाले होते हैं। भक्तों के एकदम उलट। न-न यहां सूर, कबीर, मीरा, रैदास जैसों या प्रह्लाद जैसों की बात नहीं हो रही। मतलब उन समकालीन भक्तों से है, जो ‘नॉन बायोलॉजिकल’ नेता को भगवान मान उनके प्रति पूरी तरह समर्पित हो चुके हैं। ये भक्त अपने नेता के ही नहीं, उसकी सरकार के भी हर पैâसले, हर बयान का मुखर समर्थन करते हैं।
न फुर्सत, न कूवत
अब मौन समर्थन हो तो काम थोड़ा आसान हो जाता है। कुछ समझ न आए तो चुप रहने का विकल्प उपलब्ध रहता है। लेकिन मुखरता के साथ समर्थन करना है तो फैसले को समझना होगा। उसकी खूबी-खामी पर ध्यान देना होगा। भक्तों की दिक्कत यह है कि वे किसी पैâसले को समझ नहीं सकते। न तो उनके पास इतनी फुर्सत होती है, न कूवत। मजे की बात यह है कि ऐसी कोई जरूरत भी नहीं होती। उनके आका कह चुके हैं कि पैâसलों को समझने की जहमत मोल न लो। तुम तो बस समर्थन कर दिया करो हर पैâसले का।
कुतर्क का सहारा
अब सरकार के पैâसलों को समझे बिना उनका बचाव करना है तो तर्क-वितर्क में तो उतर नहीं सकते। सो भक्तगण ज्यादातर कुतर्क से ही काम चलाते हैं। फिर भी अगर विरोधी तर्क पर उतर आए तो इनके पास राम-बाण मौजूद रहता है, ‘मोदी जी ने पैâसला किया है तो कुछ सोचकर ही किया होगा।‘ इससे तगड़ा संदेश क्या हो सकता है विरोधियों के लिए कि भैया, जब सोचने के लिए खुद मोदी जी बैठे हैं तो हम-तुम क्यों मगजमारी करें बिला वजह, लेकिन विरोधी तो विरोधी ठहरे। इस पर भी नहीं मानते और सोचने-समझने की अपनी ताकत का प्रदर्शन करने लगते हैं। ऐसे में भक्तगण अपनी क्षमता का प्रदर्शन करते हुए गाली-गलौज पर उतर आते हैं। उसके लिए कुछ सोचना या समझना तो जरूरी होता नहीं है।
भांति-भांति के पत्थर
अपने देश में आजकल राजनीतिक बहस इसी तर्ज पर चलती है, लेकिन बात हो रही थी विरोधियों की। मूल बात यह है कि विरोधी भक्तों से कोई सबक नहीं लेते। बस रात-दिन सरकार के पीछे पड़े रहते हैं। कभी चुनाव आयोग, कभी एसआईआर, कभी लोकतंत्र, कभी तानाशाही… ये अलग-अलग नाम वाले भांति-भांति के पत्थर ढूंढ लाते हैं और सरकार पर फेंकते रहते हैं। इन्हें कौन समझाए कि राजनीति करना, सत्ता हासिल करना और फिर उसे बनाए रखना कितना कठिन काम है। खासकर, तब जब सबकुछ लोकतंत्र का भरम बनाए रखते हुए करना हो।
दुर्लभ प्रजाति
आप चुनाव आयुक्त की नियुक्ति का कानून तो बदल सकते हो, लेकिन ज्ञानेश कुमार वैâसे खोजोगे। इस प्रजाति के अफसर क्या आसानी से मिलते हैं? कन्फ्यूज न हों। ज्ञानेश कुमार बनने की चाहत रखना अलग बात है और सचमुच का ज्ञानेश कुमार बन जाना बिल्कुल अलग। हद तो यह है कि जब हमारा नॉन बायोलॉजिकल नेता अपने करिश्मे से ऐसा ज्ञानेश कुमार खोज लाता है, उसे चुनाव आयुक्त के पद पर बैठा देता है, तब भी विरोधी उसे चैन से काम नहीं करने देते।
सेवक मात्र
धैर्य देखिए उस आदमी का। उसकी देख-रेख में बाकायदा चुनाव के जरिए बीजेपी की पश्चिम बंगाल का किला फतह करने की बरसों पुरानी साध पूरी होती है। इस दौरान वह आदमी सारी आलोचनाएं, सारे आरोप, सारी लानत-मलामत चुपचाप सहन करता रहता है, लेकिन चेहरे पर एक पल को भी यह भाव नहीं आने देता कि उसने कोई बहुत बड़ा काम कर दिया है। जानता है कि मौजूदा नेता के लिए वह एक सेवक मात्र है।
नहीं दिखते गुण
एक तरफ ऐसी निष्ठा, ऐसी विनम्रता और दूसरी तरफ विरोधियों की अंधी दृष्टि। उन्हें ये सब गुण दिखाई ही नहीं देते। बस एक ही रट लगाए रहते हैं लोकतंत्र, प्रâी एंड फेयर इलेक्शन। इसी चक्कर में सीएम मैडम हैं कि इस्तीफा न देने पर अड़ गईं। लेकिन उससे क्या होना था। देखा आपने राज्यपाल ने कितनी आसानी से उन्हें रास्ते से हटा दिया। ज्ञानेश कुमार जी यह बात पहले से जानते हैं कि उनके आका विरोधियों की बातों पर ध्यान ही नहीं देते। वे जो भी चीखते-चिल्लाते रहें आका जी वही करते हैं, जिसमें उनका अपना फायदा हो। और फिलहाल तो फायदा ज्ञानेश जी ही दिला रहे हैं। सो, उनका बाल भी बांका न होने देंगे आका जी।

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