मुख्यपृष्ठसमाज-संस्कृतिसंघर्षों से निकला दानवीर : शारदा प्रसाद सिंह की अनोखी कहानी

संघर्षों से निकला दानवीर : शारदा प्रसाद सिंह की अनोखी कहानी

सामना संंवाददाता / मुंबई

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की लोकसभा चुनाव क्षेत्र जिला वाराणसी जो देवभूमि काशी नगरी के नाम से विश्वप्रख्यात है इसी वाराणसी जिले के एक गांव महाराजपुर की साधारण गलियों से निकलकर समाजसेवा और जनकल्याण की मिसाल बन चुके शारदा प्रसाद सिंह का जीवन संघर्ष, मेहनत और मानवीय संवेदनाओं की अद्भुत कहानी है। ऋषिवंशी ठाकुर परिवार में 23 दिसंबर 1930 को जन्मे शारदा प्रसाद सिंह ने बचपन में गरीबी और अभावों को बेहद करीब से देखा। लेकिन कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने कभी हार नहीं मानी और अपने संघर्षों को ही आगे बढ़ने की ताकत बना लिया।

उन दिनों गांवों में शिक्षा और संसाधनों की भारी कमी हुआ करती थी। शारदा प्रसाद सिंह ने भी गांव के एक साधारण सरकारी स्कूल में पढ़ाई की, जहां न पर्याप्त सुविधाएं थीं और न आधुनिक व्यवस्था। कई बार आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर हो जाती थी कि परिवार के सामने जीवन की बुनियादी जरूरतें पूरी करना भी चुनौती बन जाता था। परिवार को सामाजिक जिम्मेदारियां निभाने के लिए जमीन तक गिरवी रखने की नौबत आई, लेकिन इन संघर्षों ने उनके इरादों को और मजबूत किया।

युवावस्था में बेहतर भविष्य की तलाश उन्हें मुंबई ले आई। सपनों के इस महानगर में उन्होंने शून्य से अपनी शुरुआत की। कठिन मेहनत, ईमानदारी और लगन के बल पर उन्होंने धीरे-धीरे अपनी अलग पहचान बनाई। सफलता मिलने के बाद भी उन्होंने कभी अपने गांव, अपनी मिट्टी और संघर्षों को नहीं भुलाया। यही वजह रही कि जीवन में स्थिरता आने के बाद उन्होंने खुद को समाजसेवा और जनहित के कार्यों के लिए समर्पित कर दिया।

शारदा प्रसाद सिंह का मानना था कि समाज को आगे बढ़ाने का सबसे बड़ा माध्यम शिक्षा है। इसी सोच के साथ उन्होंने स्कूलों और शिक्षण संस्थानों को उदारतापूर्वक सहयोग दिया। वाराणसी क्षेत्र की एक शिक्षण संस्था को विद्यालय और कॉलेज निर्माण के लिए एक करोड़ रुपये की सहायता देना उनके शिक्षा प्रेम और दूरदर्शी सोच का बड़ा उदाहरण माना जाता है। उनके सहयोग से अनेक जरूरतमंद विद्यार्थियों को बेहतर शिक्षा और अवसर प्राप्त हुए।

शारदा प्रसाद सिंह जिन्हें बाबूजी के नाम से जाना जाता है उन्हें अब तक समाजसेवा के कार्य मैं दर्जनों अवार्ड मिल चुके है ।बाबूजी ने मुंबई मैं कई शैक्षणिक संस्थाओं को आर्थिक और मानवीय मदद की।।मुंबई मैं उत्तर भारतीय समाज की सबसे बड़ी संस्था “उत्तर भारतीय संघ” की स्थापना से लेकर अब तक इस संस्था मैं कई शैक्षणिक संस्थाओं को शुरू करवाने,सामाजिक हॉल बनवाने जहां समाज के आर्थिक रूप से कमजोर बच्चियों का विवाह हो सके बाबूजी ने बनवाने मैं अपना अहम योगदान दिया।।

स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में भी उनका योगदान उल्लेखनीय रहा। उन्होंने अस्पतालों और चिकित्सा संस्थानों को समय-समय पर आर्थिक सहायता और उपकरण उपलब्ध कराए। वर्षों पहले चिकित्सा संस्थाओं को एक्स-रे मशीन और अन्य आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराना उस दौर में समाज के लिए बड़ी मदद साबित हुआ। गरीब और जरूरतमंद लोगों तक बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचे, यह हमेशा उनकी प्राथमिकताओं में शामिल रहा।

सिर्फ शिक्षा और स्वास्थ्य ही नहीं, बल्कि धार्मिक और सामाजिक कार्यों में भी उन्होंने बढ़-चढ़कर योगदान दिया। गांवों में मंदिर निर्माण, सार्वजनिक विकास कार्यों और समाजहित की योजनाओं में उनकी सहभागिता हमेशा सराहनीय रही। गुजरात सहित कई राज्यों की सामाजिक संस्थाओं और ग्राम पंचायतों ने उनके सहयोग और सेवा भावना के लिए आभार व्यक्त किया है।

शारदा प्रसाद सिंह की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि उन्होंने दान और सेवा को कभी दिखावे का माध्यम नहीं बनाया। उन्होंने हमेशा चुपचाप जरूरतमंदों की सहायता की और समाज को लौटाने को अपना कर्तव्य माना। शायद यही कारण है कि लोग उन्हें केवल एक सफल व्यक्ति नहीं, बल्कि दानवीर और समाज के सच्चे सेवक के रूप में सम्मान देते हैं।

आज उनका जीवन नई पीढ़ी के लिए एक बड़ा संदेश है कि अभाव और कठिनाइयां इंसान को रोक नहीं सकतीं। यदि इरादे मजबूत हों और मन में समाज के लिए कुछ करने की भावना हो, तो एक साधारण गांव का लड़का भी हजारों लोगों के जीवन में उम्मीद और प्रेरणा की रोशनी बन सकता है।

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