मुख्यपृष्ठस्तंभपॉलीटिका : `राज'पाल बाबू...!

पॉलीटिका : `राज’पाल बाबू…!

एम एम एस

खैर, दलपति विजय बाबू चीफ मिनिस्टर बन गए हैं। खैर शब्द का प्रयोग इसलिए क्योंकि उन्हें सीएम बनने के लिए खूब दंड मारने पड़े! इसमें `राज’पाल बाबू ने संवैधानिक तरीके से बहुत `बढ़िया भूमिका’ निभाई!
भारतीय राजनीति में जब चुनाव के नतीजे त्रिशंकु आते हैं, तो सारा ग्लैमर विधानसभा से शिफ्ट होकर राजभवन पहुंच जाता है। तमिलनाडु के २०२६ चुनावों ने हमें फिर से वही क्लासिक ड्रामा दिखाया। टीवीके सबसे बड़ी पार्टी तो बन गई, लेकिन राज्यपाल महोदय ने दलपति यानी सी. जोसेफ विजय को मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने वाले रास्ते पर स्पीड ब्रेकर लगा दिए।
दरअसल, राज्यपाल का प्राथमिक कर्तव्य है एक स्थिर सरकार का गठन। लेकिन आजकल उनका प्राइमरी टास्क हो गया है अपने आकाओं के इशारे पर उनके लिए सत्ता का रास्ता साफ करना है! भाजपा सरकार द्वारा नियुक्त राज्यपालों ने राज्यों में बिना किसी संख्या बल की जांच किए भाजपा की या भाजपा नेतृत्व की सरकार को प्राथमिकता दी है, ऐसी खबरें आप भूले नहीं होंगे, तो भईया राजभवन ने मांग की कि विजय साहब ११८ विधायकों के `प्रेम-पत्र’ यानी समर्थन पत्र लेकर आएं। अब राजनीति में ये पत्र किसी वैवाहिक निमंत्रण से कम नहीं होते, जो कभी भी बदले जा सकते हैं।
एहसान मानिएगा सुप्रीम कोर्ट के डंडे का! वो ये कि जब भी राजभवन में `चाय-नाश्ता’ लंबा खिंचता है, तो सुप्रीम कोर्ट को याद दिलाना पड़ता है कि भैया, लोकतंत्र राजभवन के सोफों पर नहीं, बल्कि विधानसभा की बेंचों पर अंगड़ाई लेता है। एस.आर. बोम्मई केस से लेकर कर्नाटक और गोवा तक, कोर्ट का संदेश साफ है कि बहुमत की असली परीक्षा फ्लोर टेस्ट यानी शक्ति परीक्षण है, न कि राज्यपाल महोदय की व्यक्तिगत संतुष्टि!
इस सच्चाई से इनकार नहीं किया जा सकता कि पर्दे के पीछे हॉर्स ट्रेडिंग और समय का खेल चलता रहता है!
क्योंकि संविधान में `उचित समय’ की कोई सटीक परिभाषा नहीं है। इसी उचित शब्द की आड़ में कभी-कभी इतना समय दे दिया जाता है कि विधायक इधर-उधर टहलने या रिजॉर्ट पॉलिटिक्स पर निकल जाते हैं। इसे सभ्य भाषा में गठबंधन और `नखलिस’ भाषा में हॉर्स ट्रेडिंग कहते हैं। राज्यपाल का काम इस घुड़दौड़ को रोकना है, न कि इसके लिए मैदान तैयार करना!
दलपति को सीएम बनना था और वे बन ही गए हैं। अब बात करते हैं सबक नाम की एक चीज की! सबक यही है कि राज्यपाल रेफरी की तरह होते हैं, उन्हें खेल शुरू करवाना चाहिए, न कि खुद बॉल लेकर बैठ जाना चाहिए। क्योंकि जनता ने वोट सरकार चुनने के लिए दिया था, राजभवन के चक्कर काटने के लिए नहीं।
राजभवन में बढ़ता राजनीतिक भेदभाव
अतीत में ऐसे कई उदाहरण है, जहां भाजपा सरकार द्वारा नियुक्त राज्यपालों ने राज्यों में बिना किसी संख्या बल की जांच किए भाजपा की या भाजपा नेतृत्व की सरकार को प्राथमिकता दी है यह भेदभाव राजभवन में हमेशा से होता आया है पर इन दिनों यह चरम पर है। दुर्भाग्य यह है कि राज्यपाल सब कुछ केंद्र में शासन कर रही राजनीतिक पार्टी के चश्मे से देखते हैं, जबकि उन्हें पैâसला राज्य के हित में लेना चाहिए। इसीलिए आजादी के बाद से लगातार राज भवन और राज्यपालों की जरूरत पर सवाल उठते रहे हैं। राज्यों की सरकारों के साथ सामंजस्य बनाकर काम करने के बजाय अधिकांश राज्यपाल केंद्र को खुश रखने के लिए सरकार के कामों में अड़ंगा पैदा करने का काम करते हैं।

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