भारतीयों की स्मरण शक्ति पर कट्टरता का जंग चढ़ गया है। इस कारण वे ताजी घटनाओं को भी भूल जाते हैं। आतंकवादियों द्वारा किए गए पुलवामा और पहलगाम जैसे भीषण हमलों को भारतीय भूल गए और इसी बहाने शुरू हुए `ऑपरेशन सिंदूर’ का आगे क्या हुआ, यह भी भूल गए। `ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान कर्नल सोफिया कुरैशी का अपमान मध्य प्रदेश के एक भाजपा के मंत्री ने किया। इस अपमानजनक टिप्पणी का मुकदमा अब भी जारी है। इसे एक वर्ष बीत जाने के बाद भी न न्याय मिला है और न ही पैâसला आया है। संबंधित मंत्री मध्य प्रदेश के मंत्रिमंडल में छाती पर `कमल’ लगाकर निर्लज्जता के साथ घूम रहे हैं। शुक्रवार को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के समक्ष जब यह मुकदमा पुन: आया, तब मुख्य न्यायाधीश भी भड़क उठे और बोले, `बहुत हो चुका है। संयम की भी सीमा होती है।’ अब उनके क्रोधित होने से भी क्या होने वाला है? न्यायपालिका के दीये के नीचे ही सबसे अधिक अंधेरा है। इसी कारण पिछले दस-बारह वर्षों में कई बुजुर्ग तो चल बसे, लेकिन समय भी धृष्टता के साथ आगे निकल गया। खैर, क्या मुख्य न्यायाधीश के क्रोधित होने से न्याय मिलेगा? या सुप्रीम कोर्ट में क्रोधित होने का भी नाटक चल रहा है? शिवसेना तोड़ने या दलबदल के मुकदमे में भी तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ राज्यपाल की अवैध कार्रवाई और विधानसभा अध्यक्ष की कार्यप्रणाली पर क्रोधित हुए ही थे, लेकिन वे क्रोधित हुए और सेवानिवृत्त हो गए। उनके बाद के दो मुख्य न्यायाधीश भी इस मामले पर क्रोधित हुए और चले गए। अब समय सूर्यकांत महोदय का है। स्वयं सूर्यकांत ने शिवसेना के लंबित मामले पर भी रोष व्यक्त किया ही है, परंतु नई तारीख देकर ठंडे पानी से स्नान करके वे शांत हो गए। इसलिए सुप्रीम कोर्ट के क्रोध को कितनी गंभीरता से लिया जाए? अब हमारे मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत इस बात पर क्रोधित हैं कि कर्नल सोफिया कुरैशी के मुकदमे का पैâसला नहीं हो रहा है और संबंधित
बेतुके मंत्री
विजय शाह को खुला छोड़ दिया गया है। उनका क्रोधित होना समय काटने की एक नीति प्रतीत होती है। २०२५ में `ऑपरेशन सिंदूर’ गाजे-बाजे के साथ शुरू हुआ। `पाकिस्तान को विश्व के मानचित्र से मिटाकर कराची, लाहौर, इस्लामाबाद और पाक अधिकृत कश्मीर पर अगले ७२ घंटों में कब्जा कर लेंगे’ जैसी गर्जनाएं शुरू हुर्इं। इससे समस्त भारतवर्ष अत्यंत रोमांचित हो गया। अखंड हिंदुस्थान का सपना मोदी-शाह साकार कर रहे हैं। वह घड़ी निकट आने के कारण मंदिरों में पूजा, अभिषेक आदि शुरू हुए, यह पूरे देश ने देखा; लेकिन जिस तरह चुनाव में इन लोगों को `ईवीएम’ आदि के माध्यम से विजय प्राप्त हुई, वैसी विजय प्रत्यक्ष रणभूमि पर नहीं मिल सकी। परिणामस्वरूप, राष्ट्रपति ट्रंप के `पीछे मुड़’ कहते ही प्रधानमंत्री मोदी ने `ऑपरेशन सिंदूर’ समेट लिया। `ऑपरेशन सिंदूर’ की `ब्रीफिंग’ जनता और मीडिया को मिले, इसके लिए सरकार ने कर्नल सोफिया कुरैशी को नियुक्त किया। उन्होंने बेहतरीन तरीके से ब्रीफिंग की। पाकिस्तान के विरुद्ध यह मुस्लिम अधिकारी एक अलग लड़ाई लड़ रही थीं। वह देश में लोकप्रिय हो गर्इं। उसी समय मध्य प्रदेश के मंत्री कुंवर विजय शाह ने कर्नल सोफिया के विरुद्ध `आतंकवादियों की बहन’ जैसे शब्दों में विष वमन किया। पूरे देश में इसके विरुद्ध आक्रोश की लहर दौड़ गई; लेकिन उस आक्रोश की लहर को पूछ ही कौन रहा है? देश के लिए प्राणों की आहुति देने वाले सैनिक को धर्म के नाम पर अपमानित करना देशद्रोह है। भारतीय संस्कृति में यह शोभा नहीं देता, लेकिन भाजपा के मंत्रियों ने उस कठिन परिस्थिति में भी यही संदेश दिया कि, `किसी भी राष्ट्रीय संकट में हम `हिंदू-मुसलमान’ विवाद करेंगे ही। हम सत्ताधारी हैं। कुछ भी अनाप-शनाप बकने का अधिकार हमें मोदी-शाह ने दिया है। राष्ट्रीय अखंडता जाए चूल्हे में।’ कुंवर विजय शाह को यही कहना था। वास्तव में ऐसे राष्ट्रघाती मंत्री को
मंत्रिमंडल से निकालकर
भाजपा से भी बर्खास्त कर देना चाहिए था। हालांकि, उस समय जन-आक्रोश होने के बावजूद उन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। जैसे-तैसे एक `एफआईआर’ दर्ज हुई, लेकिन सरकार की ओर से `अभियोजन’ (प्रॉसिक्यूशन) की अनुमति नहीं मिली। उसे एक वर्ष बीत गया। भाजपा सरकार इस मामले में कोर्ट में बेतुके मंत्री का ही `पक्ष’ लेती रही। सॉलिसिटर जनरल ने बाद में विजय शाह का बचाव किया। तब भी सुप्रीम कोर्ट क्रोधित हुआ था। यह मुकदमा केवल एक अनर्गल बयानबाजी करने वाले मंत्री के विरुद्ध नहीं है, बल्कि एक पाशविक राजनीतिक शक्ति और उसके सामने विवश हुई भारतीय न्यायपालिका के रेंगने के संदर्भ में है। जब एक आम आदमी प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री के विरुद्ध बोलता है, तो उसे जेल में डाल दिया जाता है। कहा जाता है कि सेना का मनोबल न गिराएं। फिर मध्य प्रदेश भाजपा के मंत्री कुंवर विजय शाह पर अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई? सच तो यह है कि भाजपा द्वारा उन्हें मंत्रिमंडल से हटाना ही वास्तविक कार्रवाई होती, और चूंकि भाजपा ने ऐसा नहीं किया, इसलिए न्यायालय द्वारा संज्ञान लेकर इस व्यक्ति को सीधे जेल भेजना ही न्यायपालिका से अपेक्षित था, लेकिन वह भी नहीं हुआ। सबके चेहरे से नकाब उतर गए हैं। पुलवामा में जब सैनिकों के बलिदान हुए, तब उन्हीं सैनिकों के नाम पर वोट मांगने वालों से सैनिकों के सम्मान की क्या अपेक्षा की जाए! महिलाओं को आरक्षण देने की बात करना और बहादुर कर्नल सोफिया का अपमान करना। ऐसा करने वाले अपने मंत्री के विरुद्ध एफआईआर दर्ज होने के बाद भी कोई कार्रवाई न करना ऐसे केंद्र के मौजूदा सत्ताधारियों से तो न्याय की बात ही व्यर्थ है, लेकिन हमारी अदालतें भी सेना का यह अपमान खुली आंखों से देखती हैं। फिर भी, कर्नल सोफिया मामले में न्याय में देरी होने के कारण हमारे मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत क्रोधित हैं। बेशक सरकार कहेगी, `गुस्सा हुए तो हुए, गुस्सा होकर कर क्या लेंगे?’ इसी को कहते हैं भारतीय न्यायपालिका की दुर्दशा!
