अनिल तिवारी, मुंबई
पश्चिम बंगाल में ९ मई को शुभेंदु अधिकारी ने राज्य की पहली भाजपा-नेतृत्व वाली सरकार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। असम में हिमंत बिस्वा सरमा के कल दूसरी बार १२ मई को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने की तैयारी है, जबकि बिहार में सम्राट चौधरी १५ अप्रैल को ही मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके हैं। यानी एक महीने से भी कम समय में तीन बड़े राज्यों में भाजपा या भाजपा नेतृत्व वाली सरकारें ऐसे चेहरों के नेतृत्व में सामने आई हैं, जिनकी राजनीतिक यात्रा कभी विपक्षी दलों से शुरू हुई थी और जिन पर भाजपा ने ही कभी गंभीर आरोप लगाए थे। यहीं से ‘वॉशिंग मशीन राजनीति’ का मुद्दा फिर सुर्खियों में आ गया है।
दलबदल और सत्ता का शीर्ष
विपक्ष लंबे समय से आरोप लगाता रहा है कि भाजपा पहले विपक्षी नेताओं पर भ्रष्टाचार, घोटाले या अनियमितताओं के आरोप लगाती है, फिर वही नेता भाजपा या भाजपा-समर्थित खेमे में आते ही राजनीतिक रूप से स्वीकार्य हो जाते हैं। मुख्यमंत्री बना दिए जाते हैं। पेमा खांडू, माणिक साहा और एन. बीरेन सिंह भी इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। तीनों नेता २०१६ में कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में आए और बाद में अपने-अपने राज्यो में भाजपा नेतृत्व वाली सरकार के मुखिया बन गए।
सोशल मीडिया पर यह तंज बार-बार सुनाई देता है कि यदि भाजपा किसी नेता पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाए तो उसे डरने के बजाय यह समझना चाहिए कि भविष्य में उसके लिए सत्ता का कोई दरवाजा खुल सकता है। यह व्यंग्य भले ही अतिशयोक्ति लगे, लेकिन पिछले कुछ वर्षों के उदाहरण इसे राजनीतिक बहस का गंभीर विषय बना देते हैं।
असम के हिमंत बिस्वा सरमा लंबे समय तक कांग्रेस में रहे। लुई बर्जर रिश्वत मामले में भाजपा ने उन्हें कभी जमकर घेरा था। उन्हें इस मामले में ‘मुख्य संदिग्ध’ के रूप में पेश किया था, लेकिन बाद में वे भाजपा में आ गए, मंत्री बने और फिर असम के मुख्यमंत्री बने। अब भाजपा के दोबारा सत्ता में लौटने के बाद वे लगातार दूसरे कार्यकाल के लिए भी मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं। उधर, पश्चिम बंगाल के शुभेंदु अधिकारी का मामला भी इस बहस को पुख्ता करता है। वे पहले तृणमूल कांग्रेस में थे और नारदा स्टिंग प्रकरण में उनका नाम विवादों में आया था। उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद से पुराने नारदा वीडियो और भाजपा द्वारा पहले उठाए गए आरोप फिर चर्चा में हैं। जहां तक बिहार की बात है तो बिहार में भी सम्राट चौधरी का उभार इसी ढांचे के अंतर्गत हुआ है। वे पहले राजद और जदयू की राजनीति से जुड़े थे, बाद में भाजपा में आए और अब बिहार के मुख्यमंत्री बन चुके हैं। उनके मामले में उम्र, शैक्षणिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि से जुड़े विवाद आरोपों के घेरे में रहे हैं। जिससे यह सत्यापित होता है कि भाजपा का मुख्यमंत्री चेहरा संगठन की पुरानी पंक्ति से नहीं, बल्कि दूसरे दलों से आए नेता के रूप में ज्यादा मुनासिब होता है।
जांच ठंडे बस्ते में
२०१४ के बाद भ्रष्टाचार या केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई का सामना कर रहे २५ प्रमुख विपक्षी नेता भाजपा या भाजपा नेतृत्व वाले खेमे में गए। इनमें कांग्रेस, एनसीपी, शिवसेना, तृणमूल कांग्रेस, टीडीपी, समाजवादी पार्टी और वाईएसआरसीपी इत्यादि से आए नेता शामिल थे। इनमें से २३ मामलों में जांच बंद हो गई, धीमी पड़ी या ठंडी पड़ती चली गई। महाराष्ट्र में अजीत पवार का उदाहरण इस बहस का केंद्र रहा है। ७० हजार करोड़ रुपए के सिंचाई घोटाले का आरोप वर्षों तक महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ा मुद्दा बना रहा। भाजपा ने विपक्ष में रहते हुए इस मामले को जोर-शोर से उठाया था। बाद में अजीत पवार भाजपा समर्थित सत्ता समीकरण का हिस्सा बने। यही नहीं, महाराष्ट्र की राजनीति में एनसीपी के कई नेता जैसे प्रफुल्ल पटेल, हसन मुश्रीफ और छगन भुजबल भी ऐसे उदाहरणों में गिने जाते हैं, जिन पर कभी केंद्रीय एजेंसियों या राज्य एजेंसियों की जांच रही और बाद में वे भाजपा समर्थित सत्ता खेमे के हिस्से बने। इसी सूची में कांग्रेस से भाजपा में आए अशोक चव्हाण का नाम भी आता है। आदर्श हाउसिंग सोसाइटी मामले में उनका नाम वर्षों तक राजनीतिक और कानूनी चर्चा में रहा। २०२४ में वे भाजपा में शामिल हुए और इसके बाद उन्हें राज्यसभा भेजा गया। नवीन जिंदल पर कोयला ब्लॉक आवंटन से जुड़े मामलों में जांच रही; वे भी भाजपा में आए और २०२४ में भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़े। टीडीपी से आए सी.एम. रमेश और वाई.एस. सुजना चौधरी पर आयकर, सीबीआई या ईडी से जुड़े मामले चर्चा में रहे; बाद में दोनों भाजपा खेमे में आए। महाराष्ट्र में प्रताप सरनाईक, रवींद्र वायकर, यामिनी जाधव और भावना गवली जैसे नाम भी बार-बार ‘वॉशिंग मशीन’ बहस में आते हैं। इनमें से कई नेता शिवसेना से शिंदे खेमे में गए, जो भाजपा-समर्थित सत्ता संरचना का हिस्सा बना। इस फेहरिस्त में और भी कई नाम हैं जैसे दिगंबर कामत, कृपा शंकर सिंह, के गीता, संजय सेठ, गीता कोड़ा इत्यादि-इत्यादि। जब तक ये नेता विपक्ष में थे इन पर आरोप-प्रत्यारोप का दौर चला करता था, परंतु खेमा बदलते ही सब कुछ शांत हो गया।
लोकतंत्र : नैतिकता और चुनौतियां
वर्तमान राजनीति की समस्या यहीं पैदा होती है। लोकतंत्र में किसी भी नेता पर आरोप लगना और दोष सिद्ध होना, दो अलग बातें हैं। जब तक अदालत दोष सिद्ध न करे, किसी को अपराधी कहना न्यायसंगत नहीं। लेकिन सवाल न्यायालयीन दोषसिद्धि से अधिक राजनीतिक नैतिकता का है। यदि कोई दल किसी नेता को वर्षों तक भ्रष्टाचार का प्रतीक बताता है और वही नेता दल बदलते ही उसके मंच पर सम्मानित स्थान पाता है, तो जनता के मन में संदेह उठना स्वाभाविक है। इससे भ्रष्टाचार-विरोधी राजनीति का नैतिक बल कमजोर होता है। भाजपा ने २०१४ के बाद ‘भ्रष्टाचार मुक्त शासन’ और ‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा’ जैसे नारों से अपनी राजनीतिक पहचान बनाई थी। लेकिन जब वही दल विपक्ष से आए विवादित चेहरों को मुख्यमंत्री, मंत्री, सांसद या सत्ता-साझेदार बनाता है, तो विपक्ष को यह कहने का अवसर मिलता है कि भ्रष्टाचार विरोध सिर्फ चुनावी हथियार है, सिद्धांत नहीं। यही कारण है कि ‘वॉशिंग मशीन’ शब्द अब केवल विपक्षी नारा नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति की एक बड़ी प्रवृत्ति का प्रतीक बन गया है।
अवसरवाद
संक्षेप में कहें तो यदि आरोप सत्ता पाने तक उपयोगी और सत्ता में आने के बाद अप्रासंगिक हो जाएं, तो जनता का भरोसा राजनीति, जांच एजेंसियों और नैतिकता, तीनों से उठता है। दलबदल, लोकतंत्र में नया नहीं है, लेकिन आरोपों से घिरे नेताओं की ताजपोशी यदि सामान्य राजनीतिक पद्धति बन गई, तो आने वाले समय में विचारधारा, संगठन और जनसेवा की जगह अवसरवाद ही राजनीति का मुख्य मुद्रा बन जाएगा। यही इस पूरे घटनाक्रम की सबसे गंभीर चेतावनी है।
