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यौन उत्पीड़न की पीड़िताओं पर दबाव का नया पैटर्न! …शिकायत समितियां ही कटघरे में

कार्यस्थल, शिक्षण संस्थान, सरकारी कार्यालय और धार्मिक-सामाजिक प्रभाव वाले मंच, यौन उत्पीड़न के हालिया मामलों में एक साझा पैटर्न उभरता दिख रहा है। आरोप केवल किसी एक व्यक्ति के गलत आचरण तक सीमित नहीं रह जाते, बल्कि कई मामलों में शिकायत तंत्र, आंतरिक जांच समिति और प्रशासनिक जवाबदेही भी सवालों के घेरे में आ जाती है।
सबसे ताजा और गंभीर मामला महाराष्ट्र के नासिक स्थित टीसीएस कार्यालय से जुड़ा है। रिपोर्टों के अनुसार, टीसीएस यौन उत्पीड़न और कथित धार्मिक दबाव मामले में नासिक की अदालत ने पॉश समिति की सदस्य और साइट हेड अश्विनी चैनानी की जमानत याचिका खारिज कर दी। अदालत ने माना कि शिकायत की अनदेखी केवल लापरवाही नहीं, बल्कि कथित अपराध को बढ़ावा देने जैसा गंभीर पहलू हो सकता है। इस मामले में अन्य आरोपियों की जमानत याचिकाएं भी खारिज हुई हैं। राष्ट्रीय महिला आयोग की तथ्य-जांच समिति ने भी टीसीएस नासिक कार्यालय में ‘टॉक्सिक वर्क कल्चर’, उत्पीड़न और पॉश कानून के अनुपालन में गंभीर कमी की बात कही है।
लखनऊ के केजीएमयू मामले ने भी संस्थागत जांच की विश्वसनीयता पर प्रश्न खड़े किए। महिला रेजिडेंट डॉक्टर के कथित यौन उत्पीड़न और धर्मांतरण दबाव से जुड़े मामले में आरोपी डॉक्टर की गिरफ्तारी हुई थी। रिपोर्टों के अनुसार, विश्वविद्यालय की आंतरिक शिकायत समिति ने आरोपी डॉक्टर को हटाने की सिफारिश की थी और मामला एसटीएफ जांच तक पहुंचा। ऐसे मामलों में यदि जांच समिति की संरचना ही संतुलित और संवेदनशील न हो, तो पीड़िता का भरोसा टूटना स्वाभाविक है।
नोएडा के स्टेट जीएसटी विभाग में महिला अधिकारियों द्वारा आईएएस अधिकारी संदीप भागिया पर लगाए गए आरोप भी इसी बड़े सवाल को जन्म देते हैं। रिपोर्टों में महिला अधिकारियों ने घूरने, देर रात वीडियो कॉल करने, दबाव बनाने और विरोध करने वालों को विभागीय कार्रवाई में फंसाने जैसे आरोप लगाए। कुछ रिपोर्टों में यह भी सामने आया कि शिकायत के बाद स्वतंत्र जांच के बजाय प्रशासनिक प्रक्रिया ही विवादों में घिर गई। चूंकि यह मामला आरोप और शिकायत के स्तर पर है, इसलिए अंतिम निष्कर्ष जांच के बाद ही संभव है, लेकिन आरोपों की प्रकृति गंभीर है और निष्पक्ष जांच की मांग को मजबूत करती है।
लखनऊ के चिनहट क्षेत्र में ज्योतिषी पर दर्ज मामला भी बताता है कि अंधविश्वास, भावनात्मक नियंत्रण और यौन शोषण का गठजोड़ कितना खतरनाक हो सकता है। रिपोर्टों के अनुसार, महिला ने आरोप लगाया कि स्वयंभू ज्योतिषी ने भविष्यवाणी के नाम पर उसे पति से अलग कराया, नशीला पदार्थ देकर शारीरिक शोषण किया और बाद में धन-संपत्ति लेकर फरार हो गया। पुलिस जांच जारी है।
दिल्ली के निजी प्रबंधन संस्थान से जुड़े स्वामी चैतन्यानंद सरस्वती मामले में भी शक्ति-संबंधों के दुरुपयोग का गंभीर आरोप सामने आया। दिल्ली पुलिस ने उन्हें आगरा से गिरफ्तार किया था। रिपोर्टों के अनुसार, कई छात्राओं ने यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए और अदालत ने पीड़िताओं की संख्या को देखते हुए मामले की गंभीरता पर टिप्पणी की।
इन घटनाओं से साफ है कि समस्या केवल अपराधी मानसिकता की नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की भी है जो शिकायत सुनने के बजाय दबाने लगती है। पॉश कानून का अर्थ सिर्फ समिति बना देना नहीं है। समिति में प्रशिक्षित, स्वतंत्र, संवेदनशील और महिला प्रतिनिधित्व होना चाहिए। आरोपी प्रभावशाली पद पर हो तो जांच उससे स्वतंत्र होनी चाहिए। पीड़िता पर विभागीय कार्रवाई, दबाव, चरित्रहनन या समझौते का दबाव अपने आप में संस्थागत उत्पीड़न है।
यौन उत्पीड़न के मामलों में न्याय की पहली शर्त है, पीड़िता की बात को गंभीरता से सुनना। दूसरी शर्त है, जांच समिति की निष्पक्षता। और तीसरी शर्त है, आरोपी चाहे कॉर्पोरेट पदाधिकारी हो, अधिकारी हो, डॉक्टर हो, बाबा हो या ज्योतिषी, उसके प्रभाव से जांच को मुक्त रखना। जब शिकायत तंत्र ही कटघरे में खड़ा हो जाए, तब कानून की धाराएं नहीं, व्यवस्था की नीयत पर सवाल उठता है।

टीसीएस नासिक मामले में पॉश समिति की भूमिका पर गंभीर सवाल
महाराष्ट्र के नासिक में टीसीएस यौन उत्पीड़न और कथित धर्मांतरण मामले में अदालत ने कंपनी की साइट हेड और पॉश समिति की सदस्य अश्विनी चैनानी को जमानत देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने माना कि चैनानी ने पीड़िता की शिकायत को गंभीरता से नहीं लिया और उसे नजरअंदाज किया। अदालत के अनुसार, पॉश समिति की सदस्य होने के बावजूद शिकायत पर कार्रवाई न करना केवल संवेदनहीनता नहीं, बल्कि कथित अपराध को बढ़ावा देने जैसा आचरण है। अदालत ने कहा कि चैनानी की चुप्पी और निष्क्रियता ने कार्यस्थल के विषाक्त माहौल को मजबूत किया। इस मामले में तौसीफ अत्तार, रजा मेमन, शाहरुख कुरैशी और आसिफ अंसारी की जमानत याचिकाएं भी खारिज की गई हैं। मामला कई महिला कर्मचारियों की श्िाकायतों, यौन उत्पीड़न के आरोपों और कथित धार्मिक दबाव से जुड़ा है। राष्ट्रीय महिला आयोग की तथ्य-जांच समिति ने भी टीसीएस नासिक कार्यालय में पॉश कानून के पालन में गंभीर कमियां और असुरक्षित कार्यस्थल संस्कृति की ओर संकेत किया है।
मुख्य सवाल यह है कि जब शिकायत सुनने के लिए बनी समिति ही शिकायत को अनदेखा करे, तो पीड़िता न्याय के लिए कहां जाए?

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