मनमोहन सिंह
अफगानिस्तान में तालिबान हुकूमत के साए में महिलाओं और लड़कियों की जिंदगी पहले ही बंदिशों के घने अंधेरे में दफन थी, लेकिन अब एक नए कानून ने बची-खुची उम्मीदों पर भी गाज गिरा दी है। तालिबान के सबसे बड़े लीडर हिबतुल्लाह अखुंदजादा की मंजूरी से आए ३१ दफाओं के इस नए कानून ने बाल विवाह को एक तरह से कानूनी ढाल दे दी है। इस फरमान का सबसे खौफनाक पहलू यह है कि अब एक नाबालिग, गैर-शादीशुदा लड़की की ‘खामोशी’ को ही निकाह के लिए उसकी ‘रजामंदी’ मान लिया जाएगा।
दुनियाभर के मानवाधिकार संगठनों और सोशल एक्टिविस्ट ने इस दकियानूसी कानून पर सख्त एतराज जताया है। उनका मानना है कि किसी भी सभ्य मुल्क में निकाह के लिए दोनों पक्षों की खुलकर दी गई रजामंदी लाजिमी होती है। लेकिन तालिबान हुक्मरान के खौफ के साए और खानदानी दबाव में घुट रही एक मासूम की खामोशी को ‘कबूल है, कबूल है, कबूल है’ का दर्जा दे दिया गया है। यह सिर्फ नाइंसाफी नहीं, बल्कि क्रूरता की इंतिहा है, जो लड़कियों से उनकी जुबान छीन लेती है। सितम देखिए कि इसी कानून में मर्दों या पहले से शादीशुदा औरतों की खामोशी को रजामंदी मानने से साफ इनकार किया गया है।
तालिबान ने कानून में ‘खियार अल-बुलुघ’ (बालिग होने पर निकाह को खारिज करने का अधिकार) का जिक्र तो किया है, मगर इसकी शर्तें इतनी पेचीदा हैं कि जमीनी तौर पर यह महज एक छलावा है। निकाह को रद्द कराने के लिए उन बेबस लड़कियों को तालिबान की काजी-अदालतों के चक्कर लगाने होंगे, जहां औरतों के लिए इंसाफ की उम्मीद वैसे ही दम तोड़ चुकी है।
यह नया फरमान अफगानिस्तान को इतिहास के उस अंधेरे दौर में धकेलने की साजिश है, जहां औरतों का वजूद सिर्फ पैर की जूती के बराबर था। कोई भी मासूम बच्ची निकाह जैसे जिंदगी के सबसे बड़े पैâसले के नफा-नुकसान को समझने के काबिल नहीं होती। ऐसे में उसकी चुप्पी उसकी मर्जी नहीं, बल्कि उसकी बेबसी और खौफ का सुबूत है।
तालिबान के इस कदम ने दुनिया के तथाकथित स्वयंभू समुदाय को एक बार फिर कटघरे में खड़ा कर दिया है। आज मानवाधिकारों की वकालत करने वाली दुनिया के सामने सबसे बड़ा सुलगता हुआ सवाल यही है कि इन मासूमों की इस बेजुबान चीख को आखिर कौन सुनेगा?
