मुख्यपृष्ठस्तंभप्रणवाक्षर : अब तो गलती मान लें ‘सरकार’!

प्रणवाक्षर : अब तो गलती मान लें ‘सरकार’!

प्रणव प्रियदर्शी

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबले के इस बयान को हलके में नहीं लिया जा सकता कि भारत को पाकिस्तान के साथ बातचीत के दरवाजे बंद नहीं करने चाहिए। इससे पहले यह खबर भी आ चुकी है कि भारत के कुछ पूर्व राजनयिकों और पूर्व सैन्य अधिकारियों की पाकिस्तान के ऐसे ही अधिकारियों के साथ अनौपचारिक बातचीत चल रही है। स्पष्ट है कि पाकिस्तान के प्रति नजरिये को लेकर मंथन सिर्फ संघ में नहीं, बल्कि सरकार के अंदर भी चल रहा है।
उलटी पड़ गर्इं चालें
ये संकेत मोदी सरकार की अब तक की पॉलिसी -आतंकवाद और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकते- पर नाकामी की मुहर लगा रहे हैं। ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान जिस तरह से अपनी अंतर्राष्ट्रीय साख बढ़ाने में कामयाब हुआ है, जिस तरह से अमेरिका और चीन दोनों उसके साथ खड़े दिखे हैं और रूस का रुख भी उसी की तरफ झुकता नजर आया है, वह इस बात का सबूत है कि इस मोर्चे पर मोदी सरकार की सभी चालें उलटी पड़ गई हैं। यही वजह है कि सरकार अपना रुख बदलने का प्रयास कर रही है और संघ नेता अपने बयानों के जरिए उस बदलाव के लिए जमीन तैयार कर रहे हैं।
नाकामी की वजहें
ये प्रयास कितने फलीभूत होंगे, सरकार अपने रुख में किस हद तक बदलाव ला पाएगी, उन बदलावों पर कब तक टिक पाएगी और उस नए रुख को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कितनी मान्यता मिलेगी, यह सब अभी भविष्य के गर्भ में है। लेकिन यह जरूर देखा जा सकता है कि कूटनीतिक मोर्चे पर देश के हिस्से आई ऐसी अपमानजनक नाकामी की आखिर क्या वजहें रहीं।
दोनों मोर्चों पर संतुलन
देश की संसदीय राजनीति के इतिहास पर नजर डालें तो यह स्पष्ट होता है कि अपवादों को छोड़ दिया जाए तो विदेश नीति के संबंध में विपक्ष का रुख अक्सर घरेलू जनमत को संबोधित करने वाला होता है, जबकि सरकार का रुख भू-राजनीति की वास्तविकताओं से निर्देशित होता है। इससे थोड़ी देर के लिए सरकार और विपक्ष के बीच टकराव का दृश्य भले बन जाता हो, लेकिन भारतीय लोकतंत्र के लिए तात्कालिक और दूरगामी दोनों मोर्चों पर संतुलन साधते हुए आगे बढ़ना संभव हो जाता है।
टूट गया तालमेल
इसका ताजा उदाहरण कांग्रेस के रुख में देखा जा सकता है, जिसके नेतृत्व वाली यूपीए सरकार २००४ से २०१४ तक पाकिस्तान के साथ नरम-गरम होते रिश्तों के बीच भी कोई एक्सट्रीम स्टेप उठाने से बचती रही, लेकिन अब विपक्षी दल के रूप में वह पाकिस्तान से बातचीत को लेकर सरकार के नरम पड़ते तेवर को गलत बता रही है। लेकिन तथ्य यह है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आजादी के बाद से ही कायम यह अघोषित, अनौपचारिक तालमेल हाल के वर्षों में पूरी तरह टूटता हुआ नजर आया।
सीमा पार आतंकवाद
वजह सबसे बड़ी यह रही कि नरेंद्र मोदी की अगुआई वाली बीजेपी ने २०१४ में सरकार तो बना ली, लेकिन विपक्ष का स्पेस भी खाली नहीं किया। उसकी कोशिश थी कि सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों की भूमिका उसी के हाथ में रहे। यह रवैया सबसे ज्यादा स्पष्ट रूप में जाहिर हुआ उसकी पाकिस्तान नीति में। पाकिस्तान से संबंधों के मामले में उसने सीमा पार आतंकवाद को केंद्रीय सवाल बनाते हुए बाकी सारे पहलुओं की अवहेलना की और यह सुनिश्चित किया कि उसका हर कदम, हर पैâसला घरेलू जनमत की कसौटियों पर खरा उतरता नजर आए।
एक बारीक फर्क
घरेलू जनमत का तकाजा था कि आतंकवाद की हर घटना पर सरकार र्इंट का जवाब पत्थर से देती दिखे। यहां एक बारीक लाईन होती है जिसका खयाल हर सरकार रखती आई थी। वह यह कि आप आतंकवाद से लड़ते हुए दिखना चाहते हैं या उसे सचमुच कमजोर करना चाहते हैं। ये दोनों दो बातें इसलिए हैं कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई का बड़ा हिस्सा छुपे रूप में चलता है। सारी बातें बाहर नहीं की जातीं। ऐसे कदम उठाए जाते हैं जिनसे कोई शोर नहीं होता लेकिन आतंकवाद को कमजोर करने का लक्ष्य सधता चलता है।
एक्ट ऑफ वॉर
मोदी सरकार ने पहला विकल्प चुना। उरी हमले के बाद सर्जिकल स्ट्राइक की तो उसका भी खूब ढिंढोरा पीटा। बालाकोट एयर स्ट्राइक पर तो २०१९ का चुनाव ही लड़ लिया गया। इसी तर्क की परिणति पहलगाम की घटना के बाद ऑपरेशन सिंदूर में हुई और फिर यह पॉलिसी स्टेटमेंट आ गया कि आगे से हम एक्ट ऑफ टेरर को एक्ट ऑफ वॉर मानेंगे।
देर से हुआ अहसास
इस पॉलिसी स्टेटमेंट का दरअसल क्या मतलब है और इससे देश को कितनी बार अनावश्यक युद्ध की आग में जलना होगा, इसका अहसास सरकार को बाद में हुआ, जब लाल किले के पास हुए विस्फोट को आतंकी घटना मानते हुए भी वह उसमें पाकिस्तान का हाथ नहीं बता सकी। अगर बताती तो शायद एक बार फिर उसे पाकिस्तान के साथ युद्ध में उतरना पड़ता।
ऐसी पॉलिसी चल तो नहीं सकती। सो, इसे बदलने की कवायद शुरू हो रही है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या यह सरकार इस बार गलती मानेगी या इसे भी जीत के रूप में पेश करने की हास्यास्पद कोशिश में अपनी हालत और बदतर बना लेगी।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और समीक्षक हैं।)

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