मुख्यपृष्ठस्तंभजनसंख्या बढ़ाने पर इनाम .... विकास का रास्ता या विनाश की सोच?

जनसंख्या बढ़ाने पर इनाम …. विकास का रास्ता या विनाश की सोच?

अनिल तिवारी
आंध्र प्रदेश सरकार का तीसरे बच्चे पर ₹३०,००० और चौथे बच्चे पर ₹४०,००० देने का एलान गंभीर बहस खड़ी करता है। सरकार इसे घटती जन्मदर और भविष्य की श्रम-शक्ति से जोड़कर देख रही है, लेकिन भारत जैसे देश में सवाल बड़ा है कि क्या जनसंख्या बढ़ाने के लिए नकद पुरस्कार देना सचमुच दूरदर्शी नीति है?
हिंदुस्थान आज भी जनसंख्या के भारी दबाव से जूझ रहा है। शहरों में घर महंगे हैं, गांवों में रोजगार सीमित है, शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च लगातार बढ़ रहा है। सरकारी अस्पतालों में कतारें लंबी हैं, सरकारी स्कूलों की हालत कमजोर है और युवाओं के लिए नौकरी के अवसर पर्याप्त नहीं हैं। बेरोजगारी और आर्थिक असुरक्षा का असर समाज पर भी दिखता है। साइबर अपराध, ठगी, लूट, नशा, सार्वजनिक संपत्ति पर हमले और सामाजिक तनाव जैसी घटनाएं इसी असंतुलन की चेतावनी हैं। ऐसे समय में सरकारों की प्राथमिकता होनी चाहिए कि हर बच्चे को बेहतर पोषण, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और सम्मानजनक भविष्य मिले। लेकिन यदि सत्ता तीसरे और चौथे बच्चे पर नकद पुरस्कार घोषित करने लगे, तो यह संदेश जाता है कि संख्या, गुणवत्ता से अधिक महत्वपूर्ण है। यही सोच खतरनाक है।
दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में जन्मदर घटने की चिंता वास्तविक हो सकती है, लेकिन उसका समाधान अंधी जनसंख्या-वृद्धि नहीं हो सकता। समाधान यह है कि कामकाजी महिलाओं को सुरक्षा मिले, महंगी शिक्षा और इलाज का बोझ घटे, बुजुर्गों के लिए सामाजिक सुरक्षा मजबूत हो और युवाओं को स्थायी रोजगार मिले। केवल बच्चे पैदा करने के लिए नकद राशि देना न गरीबी मिटाएगा, न बेरोजगारी घटाएगा, न सामाजिक सुरक्षा देगा।
चिंता की बात यह भी है कि कभी कोई धार्मिक-सामाजिक संगठन अधिक बच्चे पैदा करने की अपील करता है, कभी कोई नेता इसे जाति, धर्म या प्रतिनिधित्व की राजनीति से जोड़ देता है। जब समाज यह मांग करने लगे कि फलां जाति, फलां धर्म या फलां समूह का व्यक्ति ही हर पद पर हो, तब योग्यता और समान नागरिकता की जगह संकीर्ण पहचान की राजनीति खड़ी हो जाती है। जातिवाद और धर्मांधता पहले ही देश को कमजोर कर रहे हैं; ऐसे में बेतहाशा जनसंख्या-वृद्धि की सोच आग में घी डालने जैसी है।
मोहन भागवत सहित कई नेता तीन बच्चों की बात करते रहे हैं, जबकि वे जानते हैं कि देश और दुनिया संसाधनों के दबाव से गुजर रहे हैं।

क्या सरकार देगी गुणवत्तापूर्ण जीवन की गारंटी
रोजगार, शिक्षा, जल, जमीन, परिवहन और स्वास्थ्य व्यवस्था पर बोझ लगातार बढ़ रहा है। जरूरत इस बात की है कि समाज और सरकार दो बच्चों की मर्यादा, बेहतर मानव विकास और जिम्मेदार नागरिकता को बढ़ावा दें।
असली सवाल यह है कि क्या सरकार हर पैदा होने वाले बच्चे को गुणवत्तापूर्ण जीवन देने की गारंटी दे सकती है? अगर नहीं, तो जनसंख्या बढ़ाने की होड़ देश के भविष्य से खिलवाड़ है।
भारत को संख्या नहीं, सक्षम नागरिक चाहिए।
सरकारों को जनसंख्या बढ़ाने के पुरस्कार नहीं, मानव विकास की नीति बनानी चाहिए। वरना यह विकास नहीं, संसाधनों पर और बोझ डालने वाली विनाशकारी सोच साबित होगी।

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