मैं नई मुंबई के नीति निर्माताओं और आम नागरिकों का ध्यान एक बेहद गंभीर और संवेदनशील विषय की ओर आकर्षित करना चाहता हूं। नई मुंबई की परिकल्पना एक ऐसे आधुनिक और सुनियोजित शहर के रूप में की गई थी, जहां विकास और प्रकृति का सुंदर सामंजस्य होगा। लेकिन आज यह सामंजस्य बिखरता दिख रहा है। शहर को वास्तव में रहने योग्य बनाने वाले इसके सबसे अमूल्य रत्न इसकी खाड़ियों और तटरेखा पर पैâले विशाल मैंग्रोव्ज वन आज गंभीर खतरे में हैं।
मैंग्रोव्ज केवल खारे पानी में खड़े पेड़ नहीं हैं, बल्कि ये नई मुंबई के असली फेफड़े हैं। जिस तरह हमारे फेफड़े शरीर को ऑक्सीजन देते हैं, उसी तरह ये वन चुपचाप दिन-रात वाहनों के धुएं, औद्योगिक उत्सर्जन और निर्माण कार्य की धूल को सोखकर हमारी हवा को साफ करते हैं। पिछले कुछ समय से वाशी, तुर्भे, ऐरोली, कोपरखैराने और नेरुल जैसे क्षेत्रों में जो धुंध, दुर्गंध और सांस की बीमारियां बढ़ी हैं, उसकी एक बड़ी वजह इन मैंग्रोव्ज वनों का लगातार हो रहा विनाश है।
हवा साफ करने के अलावा, ये वन हमारी सुरक्षा की पहली कतार हैं। इनकी जटिल जड़ें मानसून के दौरान तीव्र ज्वारीय लहरों को रोकती हैं और तटीय इलाकों को जलमग्न होने से बचाती हैं। साथ ही, ये मछलियों, केकड़ों और अनगिनत प्रवासी पक्षियों का घर हैं, जिससे स्थानीय मछुआरा समाज की आजीविका चलती है। इसके अलावा ये सामान्य जंगलों की तुलना में कहीं अधिक तेजी से कार्बन सोखते हैं, जो ग्लोबल वॉर्मिंग से लड़ने में हमारा सबसे बड़ा हथियार है।
इसके बावजूद, विकास और लालच के नाम पर इन वनों पर लगातार अतिक्रमण हो रहा है। अवैध रूप से मलबे (डेब्रीज) का डंपिंग, प्लास्टिक कचरा और उद्योगों का केमिकल युक्त सीवेज इनकी जड़ों का दम घोंट रहा है। भू-माफियाओं द्वारा पर्यावरण नियमों को ताक पर रखकर रातों-रात मैंग्रोव्ज की जमीनों को साफ कर दिया जाता है। अधिकारियों की कार्रवाई अक्सर दिखावटी या अस्थायी होती है, जिसका खामियाजा आम नागरिकों को प्रदूषित हवा और बाढ़ के रूप में भुगतना पड़ रहा है।
अब समय आ गया है कि हम अपनी उदासीनता छोड़ें। मैंग्रोव्ज का संरक्षण केवल पर्यावरण कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि नई मुंबई के हर उस नागरिक का सामूहिक कर्तव्य है जो यहां सांस लेता है। प्रशासन को भी केवल पर्यावरण दिवस पर दिखावा करने के बजाय, नगर नियोजन नीतियों में मैंग्रोव संरक्षण को सख्ती से शामिल करना होगा। अवैध डंपिंग करने वालों पर भारी जुर्माना और निरंतर निगरानी (जैसे सीसीटीवी और ड्रोन) वक्त की जरूरत है।
– हेमंत शर्मा
सहायक जनहित अभियान
